रविवार, 30 अगस्त 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग १/४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ AI Meta*
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*४७. अध्यातम कौ अंग १/४*
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जे अध्यातम६ मन करै, सोई आवै हाथ ।
कहि जगजीवन नांउ ले, (तो) रहै रांम के साथ ॥१॥
(६. अध्यातम=आत्मा एवं परमात्मा से सम्बद्ध मनन, चिन्तन)
जो मनुष्य अध्यात्म में मन लगाता है, उसे वही फल मिल जाता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, जो राम का नाम लेता है, वह सदा राम के साथ ही रहता है, राम उससे अलग नहीं होते ।
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जिस आरंभ७ जे लगाये, तिनकूं ते ही कांम । 
कहि जगजीवन देह धरि, कोइ बिरला सुमिरै रांम ॥२॥
(७. आरंभ=नवीन कार्य या चेष्टा)
मनुष्य जिस भी नए काम / चेष्टा में अपना मन लगाता है, उसे वही काम सिद्ध हो जाता है । पर संत जगजीवनदास जी कहते हैं, देह धारण करके भी कोई बिरला ही ऐसा होता है जो सच में राम का स्मरण करता है । बाकी लोग संसारी कामों में ही लगे रहते हैं ।
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सब हूं नर आसान१ है, एक अकल२ की लार३ ।
जगजीवन उस अकल का, दाता सिरजनहार ॥३॥
(१. आसन=सरल)   {२. अकल=अकल(हिताहितविवेकनी बुद्धि)}
इंसान के लिए सब काम आसान हो सकते हैं, पर एक हित-अहित का विवेक करने वाली बुद्धि यानी अकल का मिलना सबसे कठिन है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, उस सच्ची अकल को देने वाला तो केवल वह सृजनहार परमात्मा ही है ।
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द्वादस* बाइ४ गगन घर, मगन प्रांण मन होइ ।
जगजीवन अध्यातम अैसा, जे करि जांणैं कोइ ॥४॥
*-* ४ से ९ तक साषियों में योगशास्त्र का वर्णन है ।
(३. लार=साथ)   (४. द्वादस बाइ=बारह वायु) 
बारह प्रकार की वायु को साध कर जब प्राण और मन गगन-मंडल रूपी घर में यानी सहस्रार में लीन होकर मगन हो जाते हैं, तब सच्चा अध्यात्म प्रकट होता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, ऐसा अध्यात्म कोई-कोई विरला ही जान पाता है ।
(क्रमशः)

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