🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:
卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी
नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान
=*
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*दादू परचा माँगें लोग सब,*
*कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ ।*
*समरथ मेरा सांइयाँ,*
*ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥*
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*चमत्कारिक घटनायें* =
१- एक दिन एक फोटोग्राफर आपकी फोटो लेने के लिये तैयार हुआ । किन्तु
महात्मा मोतीरामजी ने उसे निषेध कर दिया । निषेध करने पर भी चित्र लिया किन्तु
कैमरे में चित्र आया ही नहीं, फिर कुछ समय के पश्चात् वह फोटोग्राफर मर भी गया ।
२- नावां नगर के पास ही सांभर के एक श्रीमान् व्यापारी ने आपको लंगोट भेंट
करना चाहा किन्तु महात्मा मोतीरामजी ने उसे कहा “रामजी इसे तो आप ही धारण करें ।”
फिर कुछ समय के पश्चात् उक्त व्यापारी लंगोट धारण करने योग्य हो गया था
अर्थात् उसका धन नष्ट होकर वह कंगाल हो
गया ।
३- मोतीरामजी महाराज को एक से अनेक शरीर बनाने की सामर्थ्य भी प्राप्त थी ।
वे एक समय में अनेक शरीर धारण करके अनेक स्थानों में दीख जाते थे । यह बात जब
मारोठ के ठाकुर ने सुनी तब उनके मन में तर्क उठी कि यह गप्प है । ऐसा कैसे हो सकता
है ? फिर एक दिन पांचवा ग्राम के वैष्णव मन्दिर में रात्रि को जागरण की योजना थी ।
मोतीरामजी महाराज से भी भक्तगणों ने अति आग्रह पूर्वक जागरण में पधारने की
प्रार्थना की थी । अतः मोतीरामजी महाराज भी जागरण के समय वहां विद्यमान थे । उक्त
ठाकुर भी जागरण में आया और मोतीरामजी को जागरण में देखकर मन में निश्चय किया कि आज
मोतीरामजी की परीक्षा हो सकती है । ये यहां हैं । मैं अब शीघ्र ही नावां स्थान में
जाकर देखूं वहां भी मिल जायेंगे तब तो एक समय में अनेक जगह दीख जाने की बात सत्य
समझूंगा और नावां में नहीं मिले तो मिथ्या है ही । ठाकुर भरे जागरण में सहसा उठकर
बोले~ मुझे नावां अति शीघ्र जाना है,
ऐसा ही कार्य है । फिर घोड़े पर चढ़कर शीघ्र गति से नावां में मोतीरामजी महाराज के
स्थान के द्वार पर पहुँच कर कपाट खोलें की प्रार्थना की, तब मोतीरामजी ने कपाट खोल
दिये । मोतीरामजी को स्थान में देखकर ठाकुर आश्चर्य में पड़ गया । फिर
मोतीरामजी के चरण छूये और सदा के लिये
मोतीरामजी का अनन्य भक्त हो गया । एक बार तत्कालीन जोधपुर नरेश इनके दर्शन को आये
थे किन्तु उनको दर्शन नहीं दिया था । कहा भी है~
संतों में निर्पेक्षता, विशेष देखी जाय ।
मोतीराम के दर्शहित, मरू नरेश ललचाय । ४७४ । दृ. त. ११ .
४- किसान लोग आषाढ़ के मास में
बाबाजी मोतीरामजी के स्थान के पास जाकर इस आशा में बैठ जाते थे कि मोतीरामजी के
मोख से सुकाल दुष्काल की बात निकल जाय तब खेती करें । उनके मन की बात जानकार
मोतीरामजी काल, दुष्काल की बात ऊपर से ही कह देते थे । उनके मुख की वाणी सुनकर ही
आगे की खेती करते थे और जैसा मोतीरामजी महाराज कहते थे वैसा ही हो जाता था । कहा
भी है~
संत लोक हित के लिये, कहते भावी बात ।
नावे मोतीरामजी, कहते थे विख्यात । ३३२ । दृ त. ११ ।
अतः प्रतिवर्ष किसान ऐसा ही करते थे । आप अज्ञात के नाम ग्राम कुल बता देते
थे । कहा भी है~
संत जनों में होत है, दिव्य ज्ञान अभिराम ।
बिन जाने ग्राम आदि को, कहते मोतीराम । २७१ । दृ त. ११ ।
(क्रमशः)

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