🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आत्मा एक ।*
*काया के गुण देखिये, तो नाना वरण अनेक ॥*
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*भंडारी राजारामजी* = भंडारी राजारामजी नारायणा दादूद्वारे के भंडारी वर्षों रहे । आप भी प्रख्यात संत थे । आप के बड़े गुरु भाई रामरतनजी थे । रामरतनजी अपने स्थान का काम संभालते थे । रामरतनजी के चरण नानूरामजी ने और राजारामजी के चरण रामलालजी ने हाथी भाटा स्थान पर तिवारे में वि. स. १९५३ मिति जेष्ठ बदि १३ को पधराये थे ।
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*भंडारी वस्तीरामजी कुंडवाले* = वस्तीरामजी कुंडवालों की परम्परा में हैं । आप आचार्य रामलालजी के समय में १५ वर्ष, आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज के समय में २३ वर्ष, वर्तमान आचार्यजी के समय में ६ वर्ष भंडारी रहे । आपका संयमी जीवन है । आप ठीक दो बजे उठकर भजन करते हैं । चार बजे आसन छोड़कर शारीरिक क्रियाओं से निवृत होकर अरुणोदय होने पर श्री दादूमंदिर का दर्शन करने जाते हैं ।
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इस समय आपकी लगभग ९३ वर्ष की आयु है । फिर भी आप स्वाध्याय करते रहते हैं । आस पास के ग्रामों के व नारायणा के जिनके बच्चे नहीं जीते हैं, वे लोग आपके शरीर से उतरे हुये कपड़े बच्चों को पहनाते हैं, उससे से उन लोगों के मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं । आप पक्षियों को नित्य दाना चुगाते हैं, आपका जीवन सादा है ।
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इनके शिष्य कनिरामजी भी मिलनसार महानुभाव हैं । अच्छे शिक्षित हैं । सामाजिक कार्यों में भाग लेते हैं । आपने ‘स्वाध्याय संग्रह’ ग्रंथ का संपादन भी किया है । उक्त कुंडवाले स्थान की परंपरा है । इस स्थान की परम्परा में भंडारी नूंनन्दरामजी के १- शिष्य भंडारी सेवादासजी, मोहनदासजी भी हुये हैं । रामलालजी के शिष्य-पांचूरामजी उनके बालदासजी व वस्तीरामजी हुये । बालदासजी के रामधनदास और रामदास दो शिष्य थे ।
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भंडारी नूंनन्दरामजी के शिष्य मोहनदासजी जयपुर पुराणी वस्ती में अपना साधन धाम बनाकर वहां ही भजन करने लगे थे । उनके गंगादासजी और गंगादासजी के शिष्य वक्षीरामजी हुये । फिर समाप्त । उक्त प्रकार आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य टीकमदासजी की शिष्य परम्परा का परिचय है । इस परम्परा के संत सभी दादूवाणी के अनुसार भजन करते थे ।
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आचार्य चैनरामजी की शिष्य परम्परा में = नारायणा बाग़ के स्थान की परम्परा~ आचार्य चैनरामजी के शिष्य १- टीकमदास भंडारी सं. १८५३ उनके शिष्य २- धर्मदासजी सं.१८९९ ३- रूपदासजी सं. १९३३ ४- जगरामजी ५- रामनारायणजी ६- रामलालजी ७- धनीरामदासजी ८- भगवान् दासजी ९- तोलारामजी सं. १९७०-२०२५ ।
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तोलारामजी बाईजी के थांबे के स्थान महल में चले गये । उक्त स्थान की परम्परा समाप्त हो गई । उक्त स्थान के स्थानधारी सभी आचार्यों की चरण सेवा में हजूर रहते थे । इससे इस स्थान के संतों का उपनाम हजूरी हुआ है । इस स्थान के सभी संत आचार्यों की सेवा में रहने से आचार्यों के कृपा पात्र रहे हैं ।
(क्रमशः)

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