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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ४९/५२*
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प्रव्रिति१ धरम अनेक हैं, निव्रिति२ धरम मंहि नाम ।
कहि जगजीवन हरि भगत, दया धरम कहै रांम ॥४९॥
(१. प्रव्रिति धरम-लोक में प्रवृत्ति मार्ग) (२. निव्रिति धरम-संन्यास मार्ग)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रवृति मार्ग में अनेक धर्म साधन हैं, निवृत्ति मार्ग में केवल नाम स्मरण है जो प्रभु के भक्त हैं वे दया धर्म को ही प्रभु स्वरुप मानते हैं ।
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असली साध अगाध हरि, भगति पुंज भजि नांम ।
कहि जगजीवन जानिये, जस करनी तस नांम ॥५०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि असली साधु वे ही हैं जो भक्ति पुंज हैं व परमात्मा के स्वरूप को ही अगाध मानते हैं । जैसी जिसकी करणी होती है वेसा ही उसका नाम होता है ।
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परमारथ हरि क्रित सिरै, सब कोइ समझै साखि ।
कहि जगजीवन रांम कहै, रांम ह्रिदा मंहि राखि ॥५१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परमार्थ भी प्रभु कृपा करने से ही होता है । इस बात को सभी प्रमाणिक मानते हैं । संत कहते हैं कि कहो भी राम और राम को ही ह्रदय में रखो ।
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स्वारथ घट मंहि को नहीं, परमारथ है नांम ।
कहि जगजीवन तन मन हरि हरि, बदन प्रकासै रांम ॥५२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि मन में कोइ स्वार्थ न हो तो परमार्थ ही प्रभु स्मरण है । ऐसे जीव के तन मन स्मरण से प्रभु नाम ध्वनित होता है व मुख से राम नाम का प्रकाश उद्भासित होता है ।
(क्रमशः)

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