शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~१७/२०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~१७/२०*
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*सूखी शूली सौं हरि, भई भरथरी भाय ।*
*जन रज्जब ता जुगल में, पर हिं कौन के पाय ॥१७॥*
भर्तृहरि के सच्चे भाव से शूली सूखी होने पर भी हरी हो गई, यह देखकर शूली और भर्तृहरि इन दोनों में से लोग किस के चरणों में पड़ते हैं ? अर्थात भर्तृहरि के भजन का प्रताप से ही हरी हुई थी, अत: भर्तृहरि के चरणों में प्रणाम किया जाता है ।
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*जल थल महियल१ खंभ खँग२, विष वह्नि३ अहि४ लाय ।*
*रज्जब इष्ट५ न अष्ट में, बन्दहिं६ वन्दे७ भाय८ ॥१८॥*
प्रह्लाद जल में नहीं डूबा, पर्वत से नीचे स्थल में डालने से नहीं मरा, पृथ्वी१ में दबाने से, तलवार२ से काटने से विष देने से, अग्नि३ में डालने से, सर्प४ कटाने से भी नहीं मरा, खंभ से नृसिंह प्रकट हुए, इन उक्त अष्ट में से किसी का भी पूज्य५ भाव नहीं हुआ, सभी भक्त८ के भजनयुक्त सुन्दर भाव७ को ही प्रणाम६ करते हैं, अर्थात उक्त सभी कार्य भजन के प्रताप से ही सिद्ध हुये हैं ।
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*शिला तिराई समुद्र शिर, बँधी वरूण पर पाज ।*
*पै रज्जब वन्दन समय, रामचंद्र सौं काज ॥१९॥*
नल नीर ने समुद्र पर शिला तिराई, समुद्र पर सेतु बाँधा गया, किन्तु इसमें नल नील तथा समुद्र की विशेषता जानकर कोई नल नीर वा समुद्र को प्रणाम नहीं करते ! इस कार्य के लिये प्रणाम करते समय रामचन्द्रजी को ही प्रणाम करते हैं, इसी प्रकार भक्त के जीवन में जो भी विशेष घटना घटित होती है, वह उसके भजन के प्रताप से ही होती है और उसके लिये धन्यवाद भक्त को ही दिया जाता है ।
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*लोह तेल दिब१ ना दहै, सतवादी सु शरीर ।*
*तो रज्जब तिहुं तत्त्व२ में, कौन वन्दिये वीर३ ॥२०॥*
प्राचीन काल में उष्ण लोह चिपकाने तथा गर्म तेल के कहाड़ में डालने का कठोर दंड दिया जाता था, तब निर्दोषी सत्यवादी के शरीर को वे नहीं जलाते थे और सत्यासत्य का निर्णय करने के लिये पीपल का पत्ता हाथ पर रखके वा कच्चे धागे हाथ पर लपेट के उस पर अति गर्म लोहा का गोला१ रखते थे । वह निर्दोषी सत्यवादी के हाथ पर लपेट के उस पर अति गर्म लोह का गोला रखते थे । वह निर्दोषी सत्यवादी के हाथ को नहीं जलाता था, तो हे भाई३ ! अब सोचिये उक्त उष्ण लोह, तेल और लोह का गोला इन तीन वस्तुओं२ में किस की पूजा जाय ? अर्थात पूज्य तो सत्यवादी ही है, उसके सत्य के कारण उक्त तीनों नहीं जलाते, असत्यवादी और दोषी को तो जलाते ही हैं । वैसे ही भक्त के जीवन की विशेषताओं में भक्त का भजन ही हेतु है, अत: वह भजन का ही प्रताप है ।
(क्रमशः)

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