शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~१३/१६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~१३/१६*
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*मंदिर सह मूरति फिरी, मुई जिलाई गाय ।*
*नामदेव के भजन की, जन रज्जब बलि जाय ॥१३॥*
मंदिर के सहित मूर्ति फिर गई तथा मरी हुई गाय को जीवित करदी, अत: नामदेव के भजन की मैं बलिहारी जाता हूँ । विशेष ईष्यार्लु व्यक्तियों ने गाय को मार के नामदेव के द्वार पर पटक दी थी और नामदेव ने गाय मार दी यह प्रचार किया था, फिर नामदेव ने संकीर्तन करते हुये गाय को जीवित कर दिया था ।
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*नामदेव दिब१ साचे देखो, भरथरि शूली धना सुखेत ।*
*चार्यों चेतन पूजिये, रज्जब जड़ों न हेत ॥१४॥*
नामदेव के लिये मंदिर फिरा तब मंदिर की महिमा न होकर नामदेव की ही हुई । सत्यासत्य का निर्णय करने पर लोह-गोला१ की महिमा नहीं होती किन्तु सच्चे मनुष्य की ही होती है । भर्तृहरि को चोर मानकर शूली लगाई, तब शूली हरी होकर न लगने से शूली की महिमा नहीं हुई, भर्तृहरि की ही हुई । बिना बीज खेत उत्पन्न होने से खेत की महिमा नहीं हुई, धन्ना की ही हुई । परिवर्तन रूप चमत्कार उक्त मंदिरादि चार जङों में दिखाई देता है किन्तु पूजे जाते हैं नामदेवादि चेतन ही, उनकी पूजा में जड़ मंदिरादि हेतु नहीं है उनका भजन ही है ।
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*दास भाव निज दास का, दीपक राग व्यवहार ।*
*अश्मदेव तमहर जगे, धन्य जगावन हार ॥१५॥*
भगवान के निजी भक्त के दास भाव का व्यवहार दीपक राग के समान है, जैसे यर्थात रूप में दीपक राग गाने से अंधकार हटाने वाला दीपक जग जाता है, वैसे ही भक्त के यर्थात भाव से पत्थरमय परमात्मादेव की उपासना से भी अज्ञानांधकार को नष्ट करने वाला आता है ज्ञान जग जाता है, इस पर पत्थरमय देव को धन्यवाद नहीं मिलता, किन्तु उसे जगानेवाला उपासक को ही दिया जाता है ।
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*जे बिन बीजहिं खेती भई, तो खेतहिं क्या अधिकार ।*
*जन रज्जब धनि धनि धना, कहै सकल संसार ॥१६॥*
यदि बिना बीज बोय ही खेती उत्पन्न हो गई तो खेत को उसके उत्पन्न होने के धन्यवाद का क्या अधिकार है ? अर्थात नहीं, सब संसार धन्ना भक्त को ही धन्य कहते हैं, कारण धन्ना के भजन के प्रताप से ही खेत निपजा है ।
(क्रमशः)

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