*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~२१/२४*
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*पंसेरी पिछले पले, अगले वित्त१ व्यवहार ।*
*फड़का२ माँडहिं कौन दिशि, वेता३ करो विचार ॥२१॥*
तुला से वस्तु तोलते हैं तब पंसेरी तो पिछले पलड़े में रहती है और वस्तु अगले पलड़े में, धन१ देने का व्यहवार लेने देने का व्यवहार अगले पलड़े की वस्तु लेने के लिये किया जाता है और वस्तु लेने वाला पल्ला२ भी किस ओर बिछाता है ? अर्थात वस्तु वाले पलड़े की ओर ही बिछाता है । हे ज्ञानी३ ! इसका विचार करो, वस्तु तोलने में निमिति होने पर भी पंसेरी का विशेष महत्त्व नहीं, वस्तु का ही है । वैसे ही मूर्ति आदि के निमित्त से भजन किया जाता है, तो भी मूर्ति आदि का विशेष महत्व नहीं, भजन का ही है । जैसे धन से वस्तु मिलती है, वैसे ही भजन से भगवान के दर्शन मिलते हैं ।
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*रज्जब अंडे भाव के, पंखी प्राण सु दीन ।*
*सेवा के बल सुत भये, ठाहर कछू न कीन ॥२२॥*
पक्षी जिस स्थान में अंडे देता है, उस स्थान का विशेष महत्व नहीं । कारण स्थान तो कुछ भी नहीं करता, वे तो पक्षी की सेवा के बल से ही बच्चे बनते हैं । वैसे ही साधक प्राणी किसी तीर्थ स्थान में रहकर भगवान में भाव करता है तब तीर्थ स्थान भाव का पोषण नहीं करता, वह तो साधक की भक्ति के बल से ही आगे भगवत् साक्षात्कार रूप अवस्था को प्राप्त होता है वह भजन का ही प्रताप है स्थान का नहीं ।
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*तृण तरु बेली अग्नि बिन, वह्नि१ ताखे२ व्याल३ ।*
*पावक प्रकटे सकल मध्य, सो पन्नग४ पर जाल ॥२३॥*
धास, वृक्ष, लता और अग्नि के बिना ही तक्षक१ सर्प२ में विषग्नि३ उत्पन्न होता है और वह सर्प४ उसी से अन्य को जलाता है, वैसे ही तीर्थ स्नान, माला, मूर्ति आदि बाह्म साधनों के बिना ही अन्तरंग साधना रूप भजन से सभी साधकों में ज्ञानाग्नि प्रकट होता है और स्वरूप से भिन्न अज्ञानादि को जला देता है, यह भजन का ही प्रताप है, अन्य का नहीं ।
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*साधू सविता१ की कला२, शब्द सदा परकाश ।*
*वहि सुनतों वहि देखतों, उर आँख्यों तम नाश ॥२४॥*
संत सूर्य१ के तेज२ के समान हैं, जैसे सूर्य का प्रकाश आँखों से देखने पर देखने वालों के अँधकार को सदा ही हर लेता है, वैसे ही संत का शब्द सुनने वालों के हृदय का अज्ञान सदा के लिये नष्ट कर देता है ।
(क्रमशः)
*पंसेरी पिछले पले, अगले वित्त१ व्यवहार ।*
*फड़का२ माँडहिं कौन दिशि, वेता३ करो विचार ॥२१॥*
तुला से वस्तु तोलते हैं तब पंसेरी तो पिछले पलड़े में रहती है और वस्तु अगले पलड़े में, धन१ देने का व्यहवार लेने देने का व्यवहार अगले पलड़े की वस्तु लेने के लिये किया जाता है और वस्तु लेने वाला पल्ला२ भी किस ओर बिछाता है ? अर्थात वस्तु वाले पलड़े की ओर ही बिछाता है । हे ज्ञानी३ ! इसका विचार करो, वस्तु तोलने में निमिति होने पर भी पंसेरी का विशेष महत्त्व नहीं, वस्तु का ही है । वैसे ही मूर्ति आदि के निमित्त से भजन किया जाता है, तो भी मूर्ति आदि का विशेष महत्व नहीं, भजन का ही है । जैसे धन से वस्तु मिलती है, वैसे ही भजन से भगवान के दर्शन मिलते हैं ।
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*रज्जब अंडे भाव के, पंखी प्राण सु दीन ।*
*सेवा के बल सुत भये, ठाहर कछू न कीन ॥२२॥*
पक्षी जिस स्थान में अंडे देता है, उस स्थान का विशेष महत्व नहीं । कारण स्थान तो कुछ भी नहीं करता, वे तो पक्षी की सेवा के बल से ही बच्चे बनते हैं । वैसे ही साधक प्राणी किसी तीर्थ स्थान में रहकर भगवान में भाव करता है तब तीर्थ स्थान भाव का पोषण नहीं करता, वह तो साधक की भक्ति के बल से ही आगे भगवत् साक्षात्कार रूप अवस्था को प्राप्त होता है वह भजन का ही प्रताप है स्थान का नहीं ।
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*तृण तरु बेली अग्नि बिन, वह्नि१ ताखे२ व्याल३ ।*
*पावक प्रकटे सकल मध्य, सो पन्नग४ पर जाल ॥२३॥*
धास, वृक्ष, लता और अग्नि के बिना ही तक्षक१ सर्प२ में विषग्नि३ उत्पन्न होता है और वह सर्प४ उसी से अन्य को जलाता है, वैसे ही तीर्थ स्नान, माला, मूर्ति आदि बाह्म साधनों के बिना ही अन्तरंग साधना रूप भजन से सभी साधकों में ज्ञानाग्नि प्रकट होता है और स्वरूप से भिन्न अज्ञानादि को जला देता है, यह भजन का ही प्रताप है, अन्य का नहीं ।
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*साधू सविता१ की कला२, शब्द सदा परकाश ।*
*वहि सुनतों वहि देखतों, उर आँख्यों तम नाश ॥२४॥*
संत सूर्य१ के तेज२ के समान हैं, जैसे सूर्य का प्रकाश आँखों से देखने पर देखने वालों के अँधकार को सदा ही हर लेता है, वैसे ही संत का शब्द सुनने वालों के हृदय का अज्ञान सदा के लिये नष्ट कर देता है ।
(क्रमशः)

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