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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*सोई बड़भागी सदा सुहागी,*
*परगट प्रीतम संग भये ।*
*दादू भाग बड़े वर वर कर,*
*सो अजरावर जीत गये ॥३॥*
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अथ अध्याय ४ = ७ चैनरामजी की शिष्य परम्परा =
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आचार्य चैनरामजी महाराज के सुनते हैं कि शिष्य बहुत थे किन्तु ६० शिष्य तो मुख्य २ थे । आपकी शिष्य परम्परा के मुख्य २ स्थान ये हैं । १- नारायणा में कुंड वाले भंडारीजी का, २- नावाँ में, ३- इन्दावड़(मेड़ता), ४- हरमाड़ा में(गुडिया), ५- जोबनेर में भंडारी का स्थान, ६- नारायणा का स्थान बाग़ में, ७- फुलेरा में, ८- मेड़ता शहर में, ९- रेण में(मारवाड़), १०- बूडसू(मारवाड़) में, ११- खंडेल में, १२- तिलोनिया में, १३- मडावरिया, १४- झीटयां ग्राम, १५- जूनिया में, १६- राजगढ़(अलवर) में, १७- आखतड़ी में, १८- नारायणा से जयपुर पुराणी बस्ती में, १९- नारायणा में है ।
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कुंड वाले स्थान की परम्परा = १- भंडारी टीकमदासजी- आप आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य थे और ऊपर के भंडारी थे । रोकड़ा रुपया लेन देन व राजकार्य, लिखा पढ़ी आदि कार्य करने वाले को ऊपर भंडारी कहते हैं । आचार्य निर्भयरामजी के समय में सं १८३७ से ६८ तक निरंतर पीठाचार्य स्थान का कार्य किया था । टीकमदासजी आचार्य निर्भयरामजी के अत्यधिक विश्वास पात्र थे तथा प्रेमी भी थे । जहाँ भी आचार्य निर्भयरामजी जाते थे वहां टीकमदासजी भी अवश्य ही साथ २ जाते थे ।
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टीकमदासजी भंडारी राजगढ़ में अत्यधिक बीमार हुये तब आचार्य निर्भयरामजी उनके पास गये और पूछा तुम्हारी इच्छा क्या है । टीकमदासजी ने कहा~ मेरी इच्छा प्रतिक्षण आपकी सेवा में ही रहने की है । तब आचार्य निर्भयरामजी ने कहा~ ऐसा ही होगा । फिर वि. सं. १८६८ कार्तिक कृष्णा ५ मीं सोमवार को राजगढ़ में ही भंडारी टीकमदासजी का देहान्त हो गया । फिर आचार्य निर्भयरामजी ने उनकी स्मृति में एक तिबारा और एक कुई बनवाई थी । वह कुई मनी कुई के नाम से अद्यापि प्रसिद्ध है ।
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नारायणा में आचार्यों की स्मारक क्षत्रियों के सामने भंडारी टीकमदासजी की स्मारक छत्री बनवाई थी । उक्त प्रकार निर्भयरामजी महाराज ने अपने भक्त तथा गुरु भाई का सन्मान किया था । मैं सदा आपकी दृष्टि के नीचे रहूं, यह इच्छा पूर्णकर दी । इनकी छत्री से निर्भयरामजी महाराज की छत्री दीखती है । आपने आचार्य निर्भयरामजी की तथा दादू द्वारे की अच्छी सेवा की थी । आचार्य निर्भयरामजी का चातुर्मास भी टीकमदासजी भंडारी ने वि सं. १८५३ में करवाया था । टीकमदासजी ईश्वर भक्त, गुरु भक्त, श्रीमान्, समाज प्रिय, संत हुये हैं ।
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टीकमदासजी की समाधि पर शिला लेख इस प्रकार है ।
दोहा~ चढ़ि विमान टीकम चले, वसे जाय वैकुण्ठ ।
फल अपने सुकृत किये, लए एक ही उंठ ॥१॥
कार्तिक वदि शशि पंचमी, कर सुकृत दे दान ।
अष्टादश शत अडसठै, टीकम कियो पयान ॥२॥
सोरठा~ तत् शिष नानकदास, तिनके अब नौनिधी प्रकट ।
प्रफुल्लित सु प्रकाश, भंडारी भलपन भये ॥३॥
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इनका नाम कहीं टीकूदासजी और कहीं टीकमदासजी मिलता है । इनकी परम्परा के वर्तमान स्वामी कनिरारामजी ने मुझे टीकूदासजी ही लिखकर भेजा है किन्तु मुझे अन्यतर टीकमदासजी मिला था । अतः मैंने टीकूदासजी नहीं लिखा । कारण चरणों के शिलालेख में टीकमदासजी रक्खा है । इस भेद को केवल बोलने का ही भेद समझें, व्यक्ति भेद नहीं समझना है ।
(क्रमशः)

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