🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ४१/४४*
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कहि जगजीवन जमीं पर, दरखत जमैं अनेक ।
कहै सुगंधै नांम दे, सो हरि चंदन एक ॥४१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि पृथ्वी पर अनेक वृक्ष हैं पर खुशबू में चन्दन सा कोइ नहीं ऐसे ही मनुष्य तो अनेक हैं पर यश रुपी सुगंधि संतो के पास ही होती है ।
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हरि देवै सौ लीजिये, सिर चढाइ सौ बार ।
कहि जगजीवन ह्वै८ तो दीजै, सिर थैं उतरै भार ॥४२॥
(८. ह्वै=हो)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु दे वह सो बार उनकी कृपा मान कर शिरोधार्य करें अगर आप कुछ दे सकते हैं तो अवश्य दीजिये जिससे आप उऋण हो जायेंगे ।
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लीजै दीजै रांम धन, परमारथ तहँ होइ ।
कहि जगजीवन स्वारथ दुनियां, दीन९ गमावै सोइ ॥४३॥
{९. दीन-पालनीय सदाचार(धर्म)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि लेनदेन राम नाम का ही कीजिये जिससे परमार्थ होता है । शेष तो भजन के बिना जीव स्वार्थ वशीभूत हो अपना धर्म ही खो देते हैं ।
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कहि जगजीवन जांहि सब, रहसी१० रांम अगाध ।
कै कोइ हरिजन हरिभगत, हरिसेवक हरि साध ॥४४॥
(१०. रहसी=सदा रहेगा)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि संसार में सब जायेगा स्थिर तो राम का नाम ही है । जिसकी कोइ सीमा नहीं है, या फिर हरिभक्त या प्रभु सेवक या साधुजन रहेंगे ।
(क्रमशः)

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