बुधवार, 12 अगस्त 2026

= मसकीनदासोत =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*प्रेम भक्ति दिन दिन बधै, सोई ज्ञान विचार ।*
*दादू आतम शोध कर, मथ कर काढ़या सार ॥*
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अथ अध्याय ३ = मसकीनदासोत = आचार्य गरीबदासजी के पश्चात् मसकीनदासजी गद्दी पर विराजे और उनकी शिष्य परम्परा के ही संत अब तक गद्दी पर बैठते आ रहे हैं । जो गद्दी पर बैठे उनका विवरण आचार्य पर्व में आ गया है किन्तु मसकीनदासजी से लेकर आज तक के आचार्यों के अन्य भी शिष्य होते थे । उनकी शिष्य परम्परा के संत ही मसकीनदासोत कहलाते हैं ।
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३ मसकीनदासजी की शिष्य परम्परा = अब उनका ही यथा प्राप्त परिचय इस प्रसंग में दिया जायगा । भक्तमालकार राघवदासजी ने आचार्य मसकीनदासजी के चार शिष्य बताये हैं~ १-फकीरदासजी २ - चेतनदासजी ३- अतीतदासजी ४- ध्यानीबाई । अन्य भी हो सकते हैं किंतु उनका उल्लेख नहीं मिल रहा है । उक्त चारों भी मसकीनदासजी के पुत्र ही थे और शिष्य भी थे इनका ऐसा ही परिचय मिला है ।
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ध्यानी बाई ने साधन शिक्षा, सभा कुमारीजी से ली थी । अतः उनको सभा कुमारीजी की शिष्या भी अन्य ग्रन्थकारों ने लिखा है । मसकीनदासजी के समान ही उक्त तीन शिष्य भी परमविरक्त थे । अतः इन्होंने शिष्य नहीं किया तो कोई बड़ी बात नहीं है । उक्त तीनों खेजड़ाजी, भजनशाल और गरीब-गुहा पर बैठकर भजन ही करते थे । इनको अन्य प्रपंच रुचिकर नहीं था । इन्होंने कोई शिष्य किये भी हों तो उनका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है ।
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४ फ़कीरदासजी की शिष्य परम्परा = २- फ़कीरदासजी महाराज के कई शिष्य थे १- क्षेमदासजी २- गोविन्ददासजी ३- गंगारामजी ४- बड़े जैतजी ५- लघुजैतरामजी आदि । किन्तु उनकी शिष्य परम्परा का पता नहीं लगता है फिर कुछ समय पूर्व श्यामदासजी और उनके शिष्य रामनारायणजी बाट बदल फ़कीरदासजी की शिष्य परम्परा में कहे जाते थे । वर्तमान में रामनारायणजी के शिष्य प्रहलाददासजी बाट बदल हैं । इनका एक स्थान सिरोही(शेखावटी) में है । एक स्थान नारायणा में कैरिया वालों की गली में भी है । इस स्थान का एक कूप और भूमि थी ।
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नारायणा के मेलों में कच्चा सामान तोलने के समय इनकी परम्परा के साधु ताखड़ी के बाट बदला करते थे । इससे इनकी बाट बदल संज्ञा हो गई थी । सिरोही के स्थान की परम्परा १- गंगारामजी २- प्रेमदासजी ३- साहिबरामजी ४- क्षेमदासजी ५- भगवानदासजी, आगे तीन पीड़ी का नाम ज्ञात नहीं है । ९- लालदासजी १०- रामधनजी । नारायणा स्थान की परम्परा वि. सं. १८५२ में कुंजदासजी सं. १०४३ में रामदयालजी । सं. १९४४ में सूरतदासजी । सं. १९५२ मनसारामजी, शालगरामजी । सं. २००५ में श्योरामजी, रामनारायणजी, प्रहलाददासजी । उक्त सभी दादूवाणी का विचार करके उसके अनुसार निर्गुण भक्ति करने वाले थे ।
(क्रमशः)

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