*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~३३/३६*
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*गुण तारे माया तिमिर, शीत भरम मन चंद ।*
*रज्जब सुमिरन सूर सौं, सहज पड़े सब मंद ॥३३॥*
जब निरंजन नाम-स्मरण रूप सूर्य उदय होता है तब उससे क्रोधादि गुण रूप तारे, माया रूप अँधेरा, श्रम रूप शीत, ये सभी अनायास ही मंद पड़ जाते हैं ।
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*रज्जब भजन भानु उर उदित ही, अस्त होय गुण चारि ।*
*तम तारे शशि शीत गत, नर देखो सुनिहारि ॥३४॥*
सूर्य उदय होते ही तम, तारे, चन्द्रमा और शीत ये चारों ही अस्त प्राय: हो जाते हैं, वैसे ही भजन का प्रताप उदय होते ही काम क्रोधादि गुण, माया, श्रम और मन की चपलता ये चारों गुण हृदय में चले जाते हैं । हे विचारशील नरो ! तुम विचार द्वारा देखो यह बात सत्य है ।
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*नाम निरंजन उर बसे, तो कोउ गुण व्यापे नाँहिं ।*
*जन रज्जब ज्यों सर्प विष, गरुड़द्वार मुख माँहिं ॥३५॥*
जैसे गरुड़द्वार(मोर की पंखों से निकला हुआ ताँबा) मुख से होने में शरीर पर सर्प विष का प्रभाव नहीं पड़ता, वैसे ही निरंजन राम का नाम हृदय में रहने पर कामादि कोई भी मायिक गुण हृदय में व्याप्त नहीं होता अर्थात हृदय को व्यथित नहीं करता ।
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*अहि इन्द्र आतम१ डसी, विष नख शिख रह्यो छाय ।*
*रज्जब मंत्र सु राम रट, तब ही ऊतर जाय ॥३६॥*
इन्द्रिय रूप सर्प ने अन्त:करण१ को काटा है, उसका विषय रूप विष नख से शिखा पर्य्यन्त व्याप्त हो गया है । जैसे सर्प विष मन्त्र से उतरता है, वैसे ही यह विष निरंतर राम के नाम, राम मंत्र की रटन लगावे तब उतरता है ।
(क्रमशः)

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