मंगलवार, 1 सितंबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ५/८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ AI Meta*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ५/८*
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नाभि रिदै के गगन में मंहि, कै त्रिकुटि५ की संधि ।
जगजीवन रस पीजिये, मन कूं मांही बांधि ॥५॥
{५. त्रिकुटि=त्रिकूट चक्र की स्थिति(भौंहों के मध्य के कुछ ऊपर का स्थान)}
चाहे नाभि-चक्र में, चाहे हृदय में, चाहे गगन-मंडल में, या त्रिकुटी की संधि में — जहाँ भी मन को अंदर रोक कर स्थिर कर लोगे, वहीं अमृत रस पीने को मिलेगा । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, मन को बाहर नहीं, भीतर ही बांधो ।
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नासा अग्रे६ ध्यान धरि, निरखै रूप अगाध ।
जगजीवन इस घर मगन, थकित भये सब साध ॥६॥
(६. नासा अग्रे=नासिका के अगर भाग पर)
नाक के आगे वाले भाग पर ध्यान टिकाकर जब उस अगाध परमात्मा के रूप को देखा जाता है, तो इस घर में मन मगन हो जाता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, इस अवस्था को देखकर बड़े-बड़े साधक भी थकित यानी आश्चर्यचकित रह जाते हैं ।
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बंक नाल७ पच्छिम दिसा, उलटा नीर चलाइ ।
भ्रमर गुफा८ के घाटि मन, जगजीवन रस पाइ ॥७॥
(७. बंक नाल=तालुमूल में जिह्वा का स्पर्श) 
(८. भ्रमर गुफा=मेरुदण्ड के सम्मुख ग्रीवा के ऊपर का स्थान)
तालु मूल में जीभ को उलटा लगाकर — खेचरी मुद्रा करके — जब साधक अमृत रूपी जल की धारा को पश्चिम दिशा यानी सुषुम्ना की ओर उलटा चलाता है, तब मन भ्रमर-गुफा के घाट पर पहुँचकर सच्चे रस को पा लेता है । यह योग की गुप्त क्रिया का संकेत है ।
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दस९ द्वै दिनकर की किरन९, उर धरि अंबर धोइ ।
कहि जगजीवन सबद सिधि, सहज रांम धुनि होइ ॥८॥
(९-९. दस द्वै दिनकर की किरण=सूर्य की बारह कला)
सूर्य की बारह कलाओं की किरणों को हृदय में धारण करके, आकाश यानी चित्त को धोकर निर्मल कर लो । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, तब शब्द की सिद्धि होती है और सहज ही अंदर राम-नाम की धुन बजने लगती है ।
(क्रमशः) 

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