मंगलवार, 1 सितंबर 2026

*इन्दावड़ का स्थान*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*एकौं लेइ बुलाइ कर, एकौं देइ पठाइ ।*
*दादू अद्भुत साहिबी, क्यों ही लखी न जाइ ॥*
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*इन्दावड़ का स्थान*
आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा का स्थान इन्दावड़ में है । इन्दावड़ मेड़ता से १० मील पश्चिम-दक्षिण में है । इस स्थान की वैद्य हीरादासजी ने उन्नति की थी । हीरादास के गुरु परंपरा के तीन संतों का नाम नहीं हो सका । १- हीरादासजी २- सालगरामजी ३- नैनूरामजी ४- भंडारी मंगलदासजी ५- भूरादासजी वर्तमान में हैं ।
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१~ *हीरादासजी* उस प्रदेश के प्रसिद्ध संत व वैद्य थे । इन्होंने जोधपुर नरेश मानसिंह की कंठमाल खोई थी और एक पानी का कड़ाह ज़माना रूप करामात भी दिखाई थी । ये दोनों बातें इन्दावड़ में प्रसिद्ध हैं । मुझे इन्दावड़ के सबसे वृद्ध हरदीनराम राड़ जाट ने उक्त दोनों बातें सुनाई थीं । उक्त दोनों कार्यों के कारण ही जोधपुर नरेश मानसिंह ने इन्दावड़ा ग्राम में कुछ भूमि का ताम्रपत्र दिया था । हीरादासजी जोधपुर नरेश मानसिंह के समकालीन हैं । इन्दावड़ का स्थान आचार्य चैनरामजी मेड़ता में थे तब का ही है । हीरादासजी ने उन्नति की ।
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इनके पीछे ४- मंगलदासजी भंडारी इस स्थान में विशेष महानुभाव हुये । आप आचार्य दयारामजी महाराज के शिष्य वि. सं. १९५६ में हुये थे । प्रथम मेड़ता के भंडारी रहे । फिर नारायणा में आचार्य रामलालजी के समय में भंडारी रहे आपने आचार्य प्रकाशदेवजी के समय में भी आप कुछ समय भंडारी रहे । आपने आचार्य गुलाबदासजी महाराज से लेकर वर्तमान आचार्य हरिरामजी तक छः आचार्यों के दर्शन किये ।
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आचार्य रामलालजी के समय में ही उनकी आज्ञा से नैनूरामजी के अति वृद्ध होने पर इन्दावड़ गये । आप रात्रि के १२ बजे उठकर अविचल मंत्र का जप किया करते थे । यह आपका दृढ़ नियम था । इन्दावड़ स्थान की आपने उन्नति की । आपने एक कूप बनवाया जिसका नाम दयाल सागर है और खूब पानी वाला है । आचार्य प्रकाशदेवजी का चातुर्मास भी आपने इन्दावड़ में करवाया था । आपका देहान्त वि. सं. २०३२ कार्तिक शु. ७ को हुआ । आपके उत्तराधिकारी भूरारामजी वर्तमान में हैं । आप संगीत के ज्ञाता हैं । उक्त प्रकार आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा इन्दावड़ स्थान का परिचय है ।
(क्रमशः)

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