बुधवार, 2 सितंबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ९/१२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ९/१२*
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सदा सुखी नर संजमी, नित उठ साधै जोग ।
जगजीवन भगवंत भजि, भूलै षटरस भोग* ॥९॥
जो संयमी पुरुष नित्य उठकर योग साधता है, वह सदा सुखी रहता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, भगवान के भजन में ऐसा आनंद है कि छहों रसों के सांसारिक भोग फीके लगने लगते हैं ।
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रूपद्रिष्टि* आगै सुरति, ता मैं बसै अनूप ।
कहि जगजीवन एक मातरा, मिलि रहै साध सरूप ॥१०॥
(*-*. १० से १६ तक की साषियों में सांख्य दर्शन के अनुसार पच्च तन्मात्राओं का वर्णन है) हैं । [१. रूप तन्मात्रा] आँख के सामने सुरति टिकाने से उसमें अनुपम परमात्मा का वास दिखता है । एक मात्रा सिद्ध होने पर साधक साधु-स्वरूप में मिल जाता है ।  
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रस रसनां हरि रस पीवै, आंनि बिषै रस त्यागि१० ॥
कहि जगजीवन हरिजन हरि सौं, दोइ मातरा लागि ॥११॥
(१०. आंनि विषै रस त्यागि=अन्य सांसारिक विषय भोगों का परिणाम) 
[२. रस तन्मात्रा] जीभ से दूसरे विषय-भोगों के रस को छोड़कर हरि-रस पीना । दो मात्रा लगने पर हरि का जन हरि से एक हो जाता है ।
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गंध सुगंध निवास हरि, अगम बांसना जांनि ।
कहि जगजीवन तीन मातरा, आगै तत्त पिछांनि ॥१२॥ 
[३. गंध तन्मात्रा] हरि का निवास दिव्य सुगंध में है, उस अगम सुगंध को पहचानो । तीन मात्रा पूरी होने पर साधक आगे के तत्व को पहचानने लगता है ।
(क्रमशः)  

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