*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~५७/६०*
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*भजन जोर भगवन्त लग, जाति जोर लग देह ।*
*जन रज्जब साधों कह्या, जाने सो कर लेह ॥५७॥*
जाति की शक्ति तो शरीर तक ही काम देती है और भजन की शक्ति भगवान से मिलाने तक का काम करती है । संतों ने यही कहा है, किन्तु जो भजन का प्रताप जानता है वही भजन करके भगवान को प्राप्त करता है ।
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*प्रथमे१ कड़वा बीज था, पुनि पाके सोइ होय ।*
*मधि मीठा तन तोरई, रज्जब लीजे होय ॥५८॥*
पहले१ तुरई बोते हैं तब बीज कड़वा होता है, फिर पक जाने पर कड़वा हो जाता है, किन्तु बीच में तुरई मीठी होती है तब उसे सभी शाक के काम में लेते हैं, वैसे ही कुल के आगे पीछे अच्छे न हो और बीच में भक्ति हो जाय तो वह पूज्य ही है ।
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*रज्जब दादा दोजखी१, पोता पापी होय ।*
*दोन्यों बीच साधू भया, नाहिं अचरज कोय ॥५९॥*
विरोचन का दादा हिरण्यकशिपु तो नरकगामी१ हुआ और उसका पोता विरोचन भी पापी हुआ, किन्तु दोनों के बीच में प्रहलाद संत हो गया, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है । अत: उत्तमता में कुल कारण नहीं, भजन ही है ।
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*आगा क्षार समुद्र में, पीछे हिमालय मूल ।*
*जन रज्जब बिच वंदिये, गंगा का अस्थूल ॥६०॥*
गंगा की अगली धार क्षार समुद्र में है और पीछे हिमालय पर्वत उद्गम स्थान है, समुद्र और हिमालय के बीच में जो गंगा का स्थूल स्वरूप है उसी को प्रणाम करते हैं, वैसे ही आगे-पीछे कुल कैसा ही हो बीच में भक्त होगा, तो भजन के प्रताप से वही पूज्य होगा, कुल नहीं ।
(क्रमशः)

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