रविवार, 6 सितंबर 2026

१२वें आचार्य नारायणदास जी

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*ता माली की अकथ कहानी, कहत कही नहिं आवै ।*
*अगम अगोचर करत अनन्दा, दादू ये जस गावै ॥*
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१२वें आचार्य नारायणदास जी के खालसे का स्थान पहले दादूद्वारे नारायणा के बाग़ में एक था । उनमें आपकी शिष्य परंपरा के संत नानकदासजी, रामदासजी हुये हैं किन्तु उस स्थान में भी अब कोई साधु नहीं है । आचार्य नारायणदासजी की शिष्य परंपरा में चतुर्भुजजी अच्छे विद्वान् संत हुये हैं । आप सामान्य रूप से तो शास्त्रों के ज्ञाता थे ही किन्तु विशेष रूप से पौराणिक पंडित थे ।
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भागवत् व दादूवाणी की कथा विशेष रूप से करते थे । वाणी पर इनकी टिप्पणी है । आजकल नारायणा में उसी पुस्तक से कथा होती है । वि. सं. १९५० के लगभग इनका देहांत हुआ था । ये अच्छे संत थे । इनके शिष्य पंडित नन्दरामजी भी अच्छे विद्वान् थे । आचार्य दयारामजी के कथावाचक भी रहे थे । चन्द्रिका प्रसाद द्वारा संपादित दादूवाणी पर आपकी सम्मति भी छपी है ।
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१३ वें आचार्य उदयरामजी महाराज के दो शिष्य थे १~ गुलाबदासजी २-काशीरामजी । गुलाबदासजी आचार्य हुये और काशीरामजी की शिष्य परंपरा इस प्रकार है~ काशीरामजी के लक्षमणदासजी । इन दोनों के चरण एक चौकी में नारायणा में ही हैं । वि. सं. १९३६ वैशाख वदि ७ शुक्रवार को पधराये । लक्षमणदासजी के लायकरामजी उनके शिवलालदासजी । लायकरामजी के चरण शिवलालदासजी ने वि. सं. २००० कार्तिक वदि ९ शुक्र को नारायणा में पधराये ।
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शिवलालदासजी के शिष्य गोपालदासजी नलू ग्राम में रहे । उनके सुखदेवदासजी, उनके मेदरामजी वर्तमान में हैं । आचार्य उदयरामजी की परंपरा का एक स्थान मूडोती ग्राम में भी है । मेदरामजी रहते हैं किन्तु यह स्थान बहुत पुराणा है । वि. सं. १७७७ में नारायणा से पहले नारायणदासजी ने मूडोती में अपना साधन धाम बनाया था और परमार्थ के लिये एक बावड़ी बनाई थी । वि. सं. १७७७ में । उसमें शिला लेख हैं ।
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१४वें आचार्य गुलाबदासजी के दो प्रमुख शिष्य थे- हरजीरामजी तथा दयारामजी । दोनों ही आगे पीछे आचार्य गद्दी पर विराजे । इससे इनका खालसा अलग नहीं चला । इससे इनकी शिष्य परंपरा का कोई अन्य स्थान नहीं है ।
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१५वें आचार्य हरजीरामजी के दो शिष्य थे-बालदासजी पुजारी और भूरादासजी भंडारी । बालदासजी पुजारी के शिष्य बसन्तीदासजी वर्तमान हैं । भूरादासजी भंडारी के शिष्य सन्मानदासजी भंडारी वर्तमान हैं । इनकी परंपरा का अन्य कोई स्थान नहीं है ।
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१६वें आचार्य दयारामजी के अनेक शिष्य हुये हैं किन्तु कोई स्थानधारी या स्वतंत्र रूप से स्थान स्थापित नहीं किया । आपके शिष्य- १ भंडारी रामनाथदासजी । २- रामचन्द्रदासजी, ये आचार्य चैनरामजी के स्थान रैंण में चले गये । ३- बलरामदासजी ४- लालदासजी थे सिरोही(शेखावटी) के स्थान में चले गये । ५- रामलालजी आचार्य हो गये ।
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६ पं. रामदासजी कथा वाचक ये भी मेड़ता में अन्य स्थान कृष्णदेवजी महाराज के स्थान में चले गये । ७- भंडारी मंगलदासजी ये भी आचार्य चैनरामजी की परंपरा के स्थान इन्दावड़ में चले गये । ८- विदुरजी इन्होंने प्रथम चानसेन के किशनदासजी से जयपुर जेल में दीक्षा ली थी । किशनदासजी भी जमात में एक मीणे के मारे जाने से जेल में थे । जेल से छूटने पर विदुरजी आचार्य दयारामजी महाराज के साथ रहने लगेथे और आचार्यजी से सत्य उपदेश प्राप्त होने से उनको ही गुरु मानते थे ।
(क्रमशः)

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