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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग २५/२८*
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रांम निरंजन निराकार हरि, स्वाधिस्टांन४ अस्थान ।
कहि जगजीवन ब्रह्मा उतपति, सावत्री भी ग्यांन ॥२५॥
(४. स्वाधिस्टांन=हठयोग का द्वितीय चक्र)
वह राम ही निरंजन और निराकार हरि है, उसी का निवास स्वाधिष्ठान चक्र में है । संत जगजीवन जी कहते हैं वहीं से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति होती है और सावित्री रूपी ज्ञान भी वहीं से प्रकट होता है ।
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निराकार निरलेप हरि, मणिपुर५ बिसनु बिलास ।
लिछमी सक्ति तहँ रहै, सु कहि जगजीवनदास ॥२६॥
(५. मणिपुर=हठयोग का तृतीय चक्र)
जो हरि निराकार और निर्लेप है, वही मणिपुर चक्र में विष्णु रूप में विलास करता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं लक्ष्मी रूपी शक्ति भी वहीं निवास करती है ।
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परम पुरुष परमातमा, अनहद६ धुनि हरि हेत ।
कहि जगजीवन पारबतीप्रिय७, सुमिरण भये सचेत ॥२७॥
{६. अनहद=अनाहत(हठयोग का चतुर्थ) चक्र} {७. पारबती प्रिय=शिव(आदिनाथ)}
परम पुरुष परमात्मा ही अनाहत चक्र में अनहद धुनि के रूप में प्रेम रूप है । जगजीवन जी कहते हैं वहीं पार्वती-प्रिय शिव जी विराजते हैं, जिनके स्मरण से जीव सचेत हो जाता है ।
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तेज पुंज प्रकाश परम गुर, विसुध८ मारग हंस९ ।
कहि जगजीवन विद्या१० वांणी, तजै अविद्या११ अंस ॥२८॥
{८. विशुध=विशुद्ध(हठयोग का पंच्चम) चक्र} {९. हंस=अवधूत योगी)
(१०. विद्या=ब्रह्मविद्या) (११. अविद्या=अज्ञान)
विशुद्ध चक्र में तेज के पुंज स्वरूप परम गुरु का प्रकाश है और वही हंस रूपी अवधूत योगी का मार्ग है । जगजीवन जी कहते हैं वहाँ ब्रह्मविद्या की वाणी प्रकट होती है जिससे अज्ञान का अंश मिट जाता है ।
(क्रमशः)

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