सोमवार, 7 सितंबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ३३/३६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ३३/३६*
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रिदै चक्र मंहि रांमजी, रोम रोम सब ठांम ।
कहि जगजीवन जन जपै, ए अजपा ए नांम ॥३३॥
हृदय चक्र में ही राम जी हैं, जो रोम-रोम और सब जगह विराजमान हैं । जगजीवन जी महाराज कहते हैं भक्त जन इसी अजपा नाम को जपते हैं ।
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कंठ चक्र करता पुरष, करन करावन जोग ।
कहि जगजीवन ते लहैं, तिंहिं तन हरष न सोक ॥३४॥
कंठ चक्र में वह कर्ता पुरुष विराजमान है, जो सब कुछ करने-कराने योग्य है । संत जगजीवन जी कहते हैं उसे पा लेने पर शरीर में न हर्ष रहता है न शोक ।
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भौंर चक्र१ भगवंत भजि, भाव भगति रस होइ ।
कहि जगजीवन सहज मैं, सुन्नि समांवै सोइ ॥३५॥
(१. भौंर चक्र=भ्रमर चक्र) 
भ्रमर चक्र में भगवान का भजन करने से जीव में भाव-भक्ति का रस उत्पन्न होता है । संत जगजीवन जी कहते हैं की जीव उसी सहज अवस्था से शून्य में समा जाता है । 
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नोली२ बांधि भुवंगम, ये अध्यातम जोग ।
कहि जगजीवन नांउं भजि, भूलै षटरस भोग ॥३६॥
(२. नोली=नेती-धोती आदि हठयोग के छह कर्मों में से पाँचवां कर्म)
नेती-धोती से शरीर को बांध कर भुजंगम अर्थात कुंडलिनी को जगाना, यही अध्यात्म योग है । संत जगजीवन जी कहते हैं नाम भजने से साधक छहों रसों के भोगों को भूल जाता है ।
(क्रमशः)  

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