रविवार, 6 सितंबर 2026

*विदुरजी का दिगम्बर होना*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*निश वासर लागै नहीं, नहिं लागै शीतल घाम ।*
*क्षुधा तृषा लागै नहीं, घट-घट आतम राम ॥*
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*विदुरजी का दिगम्बर होना* = नारायणा दादूधाम के आचार्य दयारामजी महाराज ने गुहाला के स्थान में चातुर्मास किया था । चातुर्मास में विदुर जी भी साथ थे । एक दिन विदुर जी प्रातः स्नान करके आये थे और पहाड़ की टेकड़ी पर बने हुए स्थान में अपनी धोती खोलकर ठीक तरह बांधने लगे थे । उसी समय पांचूजी नामक एक साधू ने विदुरजी को कहा- “प्रातः काल ही क्या दर्शन करा रहा है, रोटी मिलने देगा या नहीं ।” यह सुनकर विदुरजी ने अपने मुख से कुछ नहीं कहा किन्तु धोती को वहां ही पटककर मां के गर्भ से निकले थे वैसे ही दिगम्बर रूप में महल के उत्तर की ओर अधिक ऊंचाई नहीं थी वहां से कूदकर चल दिए और सालवाड़ी डूंगरी पर जाकर ऊंधे पड़ गए ।
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४-५ दिन के पश्चात् विजारण्या जाटों की ढांणी की एक वृद्धमाता ने उनको पड़ा देखकर पूछा-महाराज ! यहां क्यों पड़े हो ? तब विदुरजी बोल तो नहीं सके किन्तु हाथ की ओक मुख के लगाकर जल मांगा । फिर बुढिया ने जल मंगवाकर विदुरजी को पिलाया और उस वृद्धा माता ने उनको दूध देकर एक दो दिन पश्चात् रोटी देना आरम्भ किया और गुहाला स्थान में सूचना दी कि आपके एक साधु दिगम्बर अवस्था में पहाड़ी पर पड़े हैं । इनको ले जाओ । फिर साधु आये भी और साथ चलने का आग्रह भी बहुत किया किन्तु न तो विदुरजी उन साधुओं के साथ गए और न पुनः वस्त्र ही धारण किए । कुछ दिन के पश्चात् उस पहाड़ी से भी विचार गये फिर रमते ही रहते थे ।
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डूंगर के मलारणे में दादूपंथी नागों की छावनी में भंडारी मोतीराम जी ने जुगतरामजी मंडलेश्वर का चातुर्मास कराया था । उस चातुर्मास में, मेरा राम भी था और विदुरजी भी थे । वे गणेशदासजी संत की कुटिया पर एक तखत पर रहा करते थे । आपका शरीर श्यामवर्ण था पेट बढ़ा हुआ था जिससे आपकी गोप्येन्द्रिय प्रायः दीखती भी नहीं थी । 
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आप परिग्रह शून्य दिगम्बर तो थे ही आपका हृदय भी परम विरक्त था ।आपकी सहन शक्ति भी विलक्षण ही थी । आप प्रतिदिन वहां मोरेढ़ नदी को लांघकर ही शौच किया करने जाते थे । चातुर्मास में भी उनका यह क्रम भारी बाढ़ आने पर ही बन्द होता था । साधारण बाढ़ से तो पार चले ही जाते थे । सारे चातुर्मास में मेरा उनसे संपर्क रहा था । वे कभी२ इच्छा होने पर अपने रचित पद्य भी सूना दिया करते थे ।
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*विदुरजी की सहन शक्ति* = एक समय जुगतरामजी की मंडली कुरुक्षेत्र सूर्यग्रहण पर जाने लगी तब विदुरजी ने भी कहा- मेरा रामजी संत दर्शन करना चाहता है, मुझे भी साथ ले चलें । मंडलेश्वरजी ने कहा- आप दिगम्बर हैं विदेश में आपको कष्ट होगा । सब प्रकार के प्राणी मिलेंगे । दुर्जन लोग आपको दुःख भी दे सकतें हैं । उस स्थिति में मंडली के सभी साधुओं को दुःख होगा । विदुरजी ने कहा- इस बात की चिन्ता मत करो, मंडली के संतों को दुःख होने की स्थिति मैं नहीं आने दूंगा । दुःख देने वालों का आघात मैं स्वयं ही सहन कर लूंगा ।
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उस वर्ष मेरा रामजी भी मंडली के साथ ही था । मैं देखता रहा कि स्थान २ पर ग्रामों में, नगरों में उन पर कहीं बच्चे ही धूलि डालते थे तो कहीं कंकर ही उन पर फैंकते थे तो कटु वचन भी सुनाते थे किंतु संत विदुरजी का उनको कुछ कहना तो दूर रहा वे उनकी ओर देखते भी नहीं थे । कुरुक्षेत्र के मेले में दशनामी नागों ने यह कहकर कि नंगे तो हम ही रह सकते हैं तुम कैसे नंगे घूम रहे हो ? ईंटें मारी । एक दो विदुरजी के लगी भी किन्तु विदुरजी उनके दर्शन कर चल दिए कुछ भी नहीं बोले । मैं साथ था, उनकी सहन शक्ति को देखकर आश्चर्य कर रहा था ।
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कहा भी है ~
“सहनशक्ति अति होत है, संत जनों के मांहिं ।
पत्थर खाते ही रहे, विदुर कहा कुछ नांहिं ।७०।दृ.त.११।
विदुरजी ने मुझे पहले ही कह कह रखा था कि मेरे साथ कोई अनुचित व्यवहार करे उस पर आप कुछ भी नहीं बोलना । अतः उनके पीछे२ अज्ञात के समान चलता था । उक्त प्रकार मेले में उन्होंने मेरे साथ घूम२ कर सब संतों के दर्शन किए । कोई उन पर श्रद्धा भी करता था, कोई नंगा फिरना बुरा भी बताता था किन्तु वे सब सुन लेते थे । कुछ बोलते नहीं थे । यह अपरिचित समाज की बात कही गई ।
(क्रमशः)

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