गुरुवार, 17 सितंबर 2026

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१३/१६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१३/१६*
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*रज्जब परखे प्राणि को, दिल में देखे जोय ।*
*जैसी ह्वै तैसी कहै, पूरा पारिख सोय ॥१३॥*
जो प्राणी के मन में स्थित दोष-गुणों को देखता है वही उसकी परीक्षा कर सकता है, फिर जैसे मन की स्थिति हो वैसा ही कथन करे, वही पुरा परीक्षक है ।
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*नख शिख काढे नजर में, मन मत१ ले निरताय२ ।*
*जन रज्जब दे हाथ में, खोटी खरी बताय ॥१४॥*
नख से शिखा पर्यन्त दृष्टि से देखे और मन के भाव१ को विचार२ करके देखे, फिर जैसे कोई वस्तु को हाथ में देकर बताते हैं, वैसे ही उसकी बुराई और सच्चाई को बता दे वही साधु की परीक्षा कर सकता है ।
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*जीव की जाणे जौहरी, परखे सौंज१ सराफ ।*
*जन रज्जब जान रु कहै, सो कहना सब माफ ॥१५॥*
जैसे रत्नों की परीक्षा जौहरी जानता है और सुवर्ण की बनी भूषणरूप सामग्री१ की परीक्षा सराफ जानता है, वैसे ही जीव के हृदय की बात तो साधु की परीक्षा करने वाला जानता है । वस्तु को जानकर उसका दोष कहा जाता है तब उसका परीक्षक का कहना सभी माफ होता है, अर्थात दोष बताने पर भी परीक्षक को दोषी नहीं कहा जाता ।
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*रज्जब मन मंडाण१ को, विरला परखणहार ।*
*नग नाणे३ अंग४ अंग२ अनन्त, बहु विधि वित विस्तार ॥१६॥*
मन की सजावट१ की परीक्षा कोई विरला ही कर सकता है । अनन्त शरीरों२ के मनों में सात्त्विक गुण रूप नग राजस-गुण रूप सिक्के३, तामसगुण रूप हीन लक्षण४ अनन्त रहते हैं, इस प्रकार बहुत प्रकार का गुण रूप धन का विस्तार मन में रहता है । अत: उसकी परीक्षा मानव नहीं कर पाता । मन की परीक्षा ही साधु परीक्षा है ।
(क्रमशः) 

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