गुरुवार, 17 सितंबर 2026

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१७/१९*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१७/१९*
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*अचेत अवस्था नींद नर, यहु चूकण की ठौर ।*
*पै सूतों१ स्यावत२ रहै, सो रज्जब शिर मौर ॥१७॥*
मनुष्य की अज्ञान१ अवस्था ही निद्रा है और यही लक्ष्य से भ्रष्ट होने का स्थान है, किन्तु जो सुप्तावस्था२ में भी ब्रह्म रूप लक्ष्य प्राप्ति के लिये सावधान है, वही हमारा शिरोमणी संत है ।
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*ज्यो जागत त्यों सोवतैं, स्वप्ने माँहिं सु होय ।*
*रज्जब पारिख१ प्रीति की, लग्न कहावे सोय ॥१८॥*
जैसी जाग्रतावस्था में लग्न हो, वैसे ही सोते समय स्वप्नावस्था में भी हो, वही प्रिति-परीक्षा१ की लग्न कहलाती है, अर्थात जागते तथा सोते जिसकी वृत्ति निरंतर ब्रह्म परायण रहती है, वही संत है ।
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*तन त्यागी त्रिभुवन भरे, मन त्यागी कोउ एक ।*
*रज्जब रैनि स्वप्न में, लहिये विगति१ विवेक ॥१९॥*
तन से कामिनी का त्याग करने वाले त्यागी तो त्रिभुवन में बहुत भरे हैं, किन्तु मन से त्यागी कोई विरला ही मिलेगा । रात्रि के समय स्वप्न में विवेक-पूर्वक देखने से अपनी विशेष दशा१ का ज्ञान प्राप्त होगा कि मैं त्यागी हूँ या रागी ।
(क्रमशः) 

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