*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~८२/८५*
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*काया कुंभनि१ पैठ तों, जीव जल स्वाद अनेक ।*
*रज्जब भगवंत भानु मिल, उभय रूप रस एक ॥८२॥*
पृथ्वी१ में जल प्रवेश करता है तब उसके अनेक स्वाद हो जाते हैं, वैसे ही शरीर में जीव प्रवेश करता है तब उनमें भी अनेक विषयों की आशा प्रकट होती है, किन्तु सूर्य की किरण द्वारा जल आकाश में जाता है और जीव को भजन द्वारा भगवान् की प्राप्ति होती है, तब दोनों के स्वरूप में एक ही रस और जीव में आत्मा स्थिति रूप रस रहता है ।
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*शूद्र वैश्य क्षत्रिय ब्रह्म, चतुर वर्ण बे काम ।*
*जन रज्जब मध्यम सभी, जो सुमिरैं नहिं राम ॥८३॥*
शुद्र वैश्य क्षत्रिय और ब्राह्मण चारों वर्णो में जो राम का स्मरण नहीं करते हैं वे सभी बेकार हैं तथा उत्तम नहीं कहे जाते ।
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*मुख भुज उपजै पेट पग, पड़ धरती धर१ होय ।*
*दंत केश विष्टा रु नख, रज्जब बिछुड़े जोय२ ॥८४॥*
जैसे शरीर के मुख के दांत, भुजा के केश, पेट का मल और पैर के नख, जब तक शरीर के लगे हैं तब तक तो उत्तम हैं, किन्तु देखो२ शरीर से अलग होकर पृथ्वी पर पड़ने से अछूत हो जाते हैं वैसे ही ईश्वर के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, पेट से वेश्य पैर से शूद्र उत्पन्न होते हैं, किन्तु ईश्वर के भजन को त्यागकर माया१ के उपासक हो जाते हैं, तब उत्तम नहीं रहते ।
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*पारस मय मूरति प्रभू, चतुर वर्ण लोह भाय ।*
*रज्जब कंचन होत है, ठाहर कहीं लगाय ॥८५॥*
पारस की मूर्ति के मुख, भुजा, पेट, पैरों में से चाहे कैसे भी स्थान पर लोह लगा दो, वह तो सुवर्ण हो ही जायगा, वैसे ही चारों वर्ण भगवान के स्वरूप में लगने से तो उत्तम हो ही जायेंगे नहीं लगे तो अधम ही हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२६. भजन प्रताप का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)
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