*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१/४*
इस अंग में साधु की परीक्षा संबन्धी विचार कहेंगे -
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*रज्जब नर नग सो सही, तम त्रासन रु उजास ।*
*जग जल में बूडे नहीं, सो हीरा हरिदास ॥१॥*
नर वही है जो अंधेरे को नष्ट करके प्रकास करे, नर वही है जो अज्ञान को दूर कर ज्ञान प्रकट करे, हीरा वही है जो जल में नहीं डूबे१, संत२ वही है जो जगत में न डूबे अर्थात ब्रह्मरूप हो जाय ।
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*महा पुरुष पारस परखि, निश्चय रूप न रंग ।*
*प्राण पषाण सु मानिये, रज्जब पलटे अंग ॥२॥*
पारस और संत की परीक्षा, रूप वा रंग से नहीं होती, लोहे को सुवर्ण व जीव को ब्रह्म बना देने से होती है जो प्राणी केवल भेषादि द्वारा रूप-रंग बदलते हैं, वे तो साधारण पत्थर के समान हैं जो साधन द्वारा संत बनते हैं, वे पारस के समान हैं ।
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*तन मन तेल कड़ाह विधि, तपता शीतल होय ।*
*सो साधु स्रक१ बावना२, रज्जब लीजे जोय ॥३॥*
कड़ाह के तपे हुये तेल में फूल माला१ डालने से तेल शीतल हो जाय, तो समझना चाहिये यह माला बावने चन्दन२ के फूलों की है, वैसे ही दुखों से संतप्त तन मन को अपने उपदेश से शीतल करदे वही संत है यही संत और बावने चन्दन की परीक्षा है ।
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*रज्जब रचना रहित की, दर्श परस दर्शन्त ।
वपु संयम वाणी विमल, वदन३ ज्योति१ झलकन्त२ ॥४॥*
अज्ञानादि विकार रहित संत की चेष्टादि रचनायें, दर्शन तथा मिलन से आप ही ज्ञात हो जाती हैं, उनके शरीर में पूर्ण संयम, वाणी में पवित्रता और मुख३मंडल पर ब्रह्म तेज१ चमकता२ रहता है ।
(क्रमशः)

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