रविवार, 20 सितंबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ४५/४८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ४५/४८*
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कहि जगजीवन सांस मंहि, रांम निरंजन वास ।
ज्यूं चात्रिग२ जल बूंद कों, यों जन पिव पिव प्यास ॥४५॥
(२. चात्रिग=चातक पक्षी, जो स्वाति नक्षत्र में मेघवृष्टि का जल ही पीता है)
संत जगजीवन जी कहते हैं साँसों में ही निरंजन राम का वास है । जैसे चातक पक्षी को स्वाति की बूंद की प्यास लगी रहती है, वैसे ही भक्त जन पिय-पिय की रट लगाए रहता है ।
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कहि जगजीवन खेलतां, खाता पीता राम ।
हंसतां रोवतां बोलतां, एक निरंजन नाम ॥४६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, ज्ञानी भक्त के लिए तो खेलते हुए, खाते-पीते हुए, हँसते हुए, रोते हुए, बोलते हुए - हर क्रिया में बस एक ही निरंजन राम का नाम रहता है । वह हर काम करते हुए भी राम को नहीं भूलता, उसका हर श्वास ही राम-नाम हो जाता है ।
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कहि जगजीवन जोग मंहि, भाव भगति रस भोग ।
ए अध्यातम अलख हरि, तिहि तन हरष न सोक ॥४७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, सच्चा योग तो वही है जहाँ भाव-भरी भक्ति का रस भोगा जाए । जो अध्यात्म के द्वारा उस अलख हरि को पा लेता है, उसके शरीर में न तो ज्यादा खुशी रहती है, न ज्यादा दुःख । वह हर हाल में एक समान रहता है ।
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कहि जगजीवन कंवल मंहि, किरण अनंत कहंत ।
केवल करता बिसंभर, अबिगत आप रहंत ॥४८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, हमारे हृदय-कमल के अंदर उस परमात्मा की अनंत किरणें चमक रही हैं । वही एक करतार सबका भरण-पोषण करने वाला है, वही बिसंभर है, जो खुद अव्यक्त रूप से सबमें रहता है ।
(क्रमशः) 

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