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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ४९/५२*
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कहि जगजीवन खोजि तन, खसम३ लहै तजि खाख४ ।
खिजमत कीजै खरी५ खरि, तौ तन कोड़ी लाख ॥४९॥
(३. खसम=पति) (४. खाख=धूल या राख) (५. खिजमत खरी खरि=शुद्ध निष्कलंक सेवा)
संत जगजीवन जी कहते हैं, इस शरीर के अंदर ही खोज कर अपने मालिक, अपने पति रूपी परमात्मा को पा लो, और इस शरीर की धूल, राख जैसी ममता को छोड़ दो । अगर तुम शुद्ध, निष्कलंक भाव से उसकी सेवा करोगे, तो ये कौड़ी जैसा तुच्छ शरीर भी लाखों-करोड़ों जैसा अनमोल हो जाएगा ।
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कहि जगजीवन गाइ गुन, गहरी बात बिचारि ।
गगन मंडल मैं मगन ह्वै, गुनसागर गहि जारि ॥५०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, हरि के गुणों को गाओ और इस गहरी बात पर विचार करो । इस संसार से ऊपर उठकर, गगन मंडल में मगन हो जाओ, और उस गुणों के सागर परमात्मा को पकड़कर, संसार की माया को जला डालो ।
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कहि जगजीवन धणी कर, काया धासै नाम ।
जो घर घेरै पंच६ ऐ, तौ रस प्यावै राम ॥५१॥
(६. पंच=पाँचों इन्द्रियों पर संयम)
संत जगजीवन जी कहते हैं, जो अपने मालिक राम के नाम से इस काया को सुवासित कर लेता है, और जो अपने घर रूपी शरीर में पाँचों इंद्रियों को वश में करके रखता है, तो राम स्वयं उसे अपने प्रेम का रस पिलाते हैं ।
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कहि जगजीवन नाद मंहि, निहचल राखै ब्यंद ।
जोग जुगति जीवन ग्रहै, तौ जक७ पावै ज्यंद८ ॥५२॥
(७. जक=संतोष, तृप्ति) (८. ज्यंद=प्राण)
संत जगजीवन जी कहते हैं, जो साधक भीतर के अनहद नाद में अपने बिंदु, अपने मन को स्थिर रखता है, और योग की युक्ति से जीवन को संभालता है, तो उसके प्राणों को सच्चा संतोष और तृप्ति मिल जाती है ।
(क्रमशः)

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