सोमवार, 21 सितंबर 2026

*युगल बाइयों का दृढ निश्चय =*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।*
*अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥*
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*= पद =* 
आप आपणे में खोजो रे भाई, वस्तु अगोचर गुरु लखाई ॥ टेक ॥ 
ज्यौं मही विलोये माखण आवे, त्यों मन मथियाँ तैं तत पावे ॥१॥ 
काष्ट हुताशन रह्या समाई, त्यों मन मांहि निरंजन राई ॥२॥ 
ज्यों अवनी में नीर समाना, त्यों मन माहिं साँच सयाना ॥३॥ 
ज्यों दर्पण के नहिं लागे काई, त्यों मूरति मांहीं निरख लखाई ॥४॥ 
सहजैं मन मथिया तैं तत पाया, दादू उन तो आप लखाया ॥५॥ 
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उक्त उपदेश के अनुसार साधना करके युगल बाइयाँ गार्गी सुलभा के समान योगिनियां हो गई थीं और आजन्म शीलव्रत से ही रही थीं । आमेर में वहाँ पंडितों ने बाइयों का विवाह कराने के लिये आंदोलन किया था तथा आमेर नरेश मानसिंह को प्रेरित किया था और आग्रह किया था कि आप दादूजी को कहकर बाइयों का विवाह करावें । 
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पंडितों के आग्रह से आमेर नरेश मानसिंह ने दादूजी महाराज से प्रार्थना की कि स्वामिन् ! बाइयों का विवाह संस्कार तो करा ही देना चाहिये । तब दादूजी महाराज ने कहा~ बाइयों से पूछ लो । फिर राजा मानसिंह ने बाइयों के पास जाकर उनसे प्रार्थना की~ बाइयों ! आपको विवाह संस्कार अवश्य करा ही लेना चाहिये । तब राजा को बाइयों ने दादूजी महाराज की यह साखी सुनाई~ 
‘जे था कंत कबीर का, सोई वर बरहूँ । 
मनसा वाचा कर्मना, मैं और न करहूँ ॥ 
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कहा भी है~
नृप पूछी आमेर के, बाइयों को दो व्याहि । जो
पति वरयो कबीरजी, सो करि वियो१ न जाहि ॥  
पूर्वकाल के कबीरादि संतों ने जो वर वरा था, उसी परमात्मा को हम वर बनायेंगी । हम मन वचन कर्म से कहती हैं~ अन्य१ किसी को भी स्वामी नहीं बनायेंगी । हमारा स्वामी तो एक परब्रह्म परमात्मा ही है । 
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*युगल बाइयों का दृढ निश्चय =* 
फिर सभाकुमारीजी ने कहा~ राजन्  ! हमारे आगे यह प्रस्ताव रखने से पहले आपको कुच्छ विचार कर लेना चाहिये था । यह प्रस्ताव यदि संसार दशा की बाइयों के पास रक्खा जाता तब तो उचित ही समझा जाता किन्तु हमारे आगे रखना व्यर्थ है, हमारा मन तो परब्रह्म के चिन्तन में लीन रहता है । हमारे मन में विषय सुख संबन्धी संकल्प ही नहीं है । हमें विषयानन्द से अति श्रेष्ठ भजनानन्द मिल रहा है । 
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अम्रित पान करने वाले खाटी छाछ से बनी हुई राबड़ी पीने की इच्छा करेंगे क्या ? वैसे ही जिनको भजनानन्द प्राप्त होता है, वें विषय सुख की इच्छा कभी भी नहीं करते हैं । विषय सुख संबन्धी विचार प्रभु भक्ति से हीन प्राणियों में ही उठते हैं । प्रभु भक्ति ह्रदय में आने पर तो विषय सुख से उपराम हो जाता है । यदि विषय सुख श्रेष्ठ होता तो अनेक राजा महाराजाओं ने उसे त्याग करके भगवद् भक्ति सुख के लिये राज्य का भी त्याग करके वनवासी नहीं बनते । 
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आपको जो इस कार्य में प्रवृत्त करने वाले हैं, वे तो विषय जल की मीन बने हुये हैं । उनको विषय से भिन्न कुछ नहीं भासता । वे संसार दशा के लोग हैं किन्तु हमारी स्थिति उनसे भिन्न ही है । जो सांसारिक प्राणी होते हैं, वे अपने मन के समान ही भक्तों का मन भी समझते हैं, यह उनका अज्ञान ही है । भक्तों के मन में अज्ञानियों के समान विचार नहीं होते हैं । भक्तों के मन में विवेक होता है । वे भलीभांति समझते हैं कि ये सांसारिक विषय सुख हमने प्रति जन्म में भोगे हैं, इनसे आज तक तृप्ति नहीं हुई तो अब क्या होगी । 
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भोग भोगने से तो भोगों की आशा अधिक ही बढ़ती है । घृत डालने से अग्नि शान्त नहीं होती है उलटी बढ़ती ही है । अतः वे संसार के विषय सुख भक्तों के आगे कोई महत्व नहीं रखते हैं । भक्तों को नीरस प्रतीत होते हैं ।इससे उनका त्याग करके ही भक्त लोग भजनानन्द प्राप्त करते हैं और सांसारिक प्राणी तो कुत्ते के समान होते हैं । जैसे कुत्ता खाकर उलटी कर देता है फिर उस उलटी को भी खा जाता है, वैसे ही ये संसार के सभी विषय प्राणी के भोगे हुये हैं । प्रत्येक जन्म में इनको भोगता आया है फिर भी उन झूंठे पदार्थों को ही भोगता रहता है और अपने मन में फूलता रहता है । 
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अतः हमारे विवाह संबन्धी विचार तुम मन से निकाल दो और अपने करने योग्य कार्य करो । किसी के बहकाने से बिना विचार ऐसे प्रश्न नहीं उठाओ । फिर दोनों बाइयां राजा को सिंह रूप में दीखने लगी, तब राजा डर गया । इससे दोनों बाइयों को प्रणाम करके राजा दादूजी के पास आ गया । इस उकर प्रसंग से सिद्ध होता है कि बाइयां योग युक्त तथा दृढ़ निश्चय वाली थीं । युगल बाइयों ने अपना साधनधाम नारायणा ही रखा था । आपका स्थान नारायणा दादूद्वारे में बाईजी की पालकां के नाम से प्रसिद्ध है ।
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केवलरामजी जब गद्दी का मोह छोड़कर अलग हो गये थे, तब अनेक साधु गद्दी पर बैठने को तैयार हुये थे । उस समय सभाकुमारीजी बाईजी ने ही गद्दी की रक्षा की थी । सभाकुमारीजी ने साधु समाज में खड़े होकर कहा था कि~ गद्दी का अधिकारी होगा और समाज एक मत होकर जिसे बैठायेगा, वही गद्दी पर बैठ सकेगा । बाईजी का उक्त वचन सुनकर सब शांत हो गये थे । कारण- बाईजी का तप का तेज ऐसा ही था, वे महान् महात्मा थीं । फिर जब समाज एक मत होकर मसकीनदासजी को बैठाने में राजी हो गया  तब ही आपने गद्दी का संरक्षण छोड़ा था । इससे सूचित होता है कि बाईजी की आज्ञा को सब मानते थे । कारण वे महान् संत थीं । 
(क्रमशः)

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