गुरुवार, 24 सितंबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ६१/६४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ६१/६४*
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त्रिकुटी५ आगै भीजिये, सो हूनर हरि नाउं ।
कहि जगजीवन नीपजै, नूर पिवै निज ठाउं ॥६१॥
(५. त्रिकुटी=भौंहों के मध्य कुछ ऊपर का स्थान)
त्रिकुटी से आगे भीगना, डूबना ही हरि नाम का सच्चा हुनर है । हे नर ! सच्चा मनुष्य वही है जो इस हुनर को करे, वही प्रधान कर्ता है । जो कर्ता होते हुए भी अकर्ता रहे, देह में रहते हुए भी विदेह रहे ।
जगजीवन जी महाराज कहते हैं - तर्क-वितर्क, चतुराई हुनर नहीं है । सच्चा हुनर, सच्ची कला तो यही है कि तुम उस नाम में भीग जाओ, डूब जाओ । फिर तुम नहीं रहते, बस हरि ही रह जाता है ।
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हूनर तू नर नांव नर, करतब करता६ एह ।
कहि जगजीवन करै अकरता, देही मांहि बिदेह ॥६२॥
(६. करतब करता=प्रधान कर्ता)
संत जगजीवन जी कहते हैं, नर कहलाने लायक नर तो वही है जिसमें यह हुनर है । और यह हुनर क्या है ? यही कि वह कर्ता होते हुए भी अकर्ता हो जाए । हम सब कर्ता हैं - मैं कर रही हूँ, मैंने किया । इसी 'मैं' से सारा बंधन बनता है । सच्चा नर वह है जो संसार के सारे काम करे - सेवा भी करे, व्यवहार भी निभाए, पर भीतर से जाने कि करने वाला मैं नहीं, कराने वाले दादूजी है । हाथ उसके, सत्ता हरि की । जैसे एक अच्छी नौकरानी घर का सारा काम करती है पर जानती है घर मेरा नहीं है । और जब कोई कर्ता होते हुए भी अकर्ता हो गया, तो वह देह में रहते हुए भी विदेह हो गया । शरीर में है, पर शरीर का नहीं है । कमल के पत्ते पर पानी की तरह ।
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षिर मंहि अक्षर खोज हरि, तो खिरै न कबहूं खोड़ि७ ।
कहि जगजीवन नांव भजि, वपु मंहि बावन जोड़ि८ ॥६३॥
(७. खोड़ि=गड्ढा, खोखला । ८. बावन जोड़ि=शरीर ५२ बंधनों से बंधा)
सिर के अंदर ही हरि रूपी अक्षर को खोज लो तो शरीर कभी खोखला नहीं होगा । जगजीवन जी महाराज कहते हैं नाम को भजो, ये शरीर ५२ बंधनों से बंधा है ।
("वपु मंहि बावन जोड़ि" - इसके दो बहुत ही सुंदर अर्थ हैं, 
१. पहला अर्थ - ५२ अक्षरों का जाल : हमारी हिंदी वर्णमाला में मूल ५२ अक्षर माने गए हैं( स्वर-व्यंजन मिलाकर)। संत कहते हैं कि यह सारा संसार इन ५२ अक्षरों के जाल से ही बना है । शास्त्र, वेद, पुराण, झगड़ा, तर्क-वितर्क, मान-बड़ाई सब इसी बावन अक्षर में उलझा है । यह पढ़ा-लिखा ज्ञान है, पर यह मुक्त नहीं करता । और हरि रूपी एक अक्षर - जो अ + क्षर = जिसका नाश न हो, वह अविनाशी नाम है । वह आँखों से पढ़ा नहीं जाता, वह तो सुरति से खोजा जाता है । तो जगजीवन जी महाराज कहते हैं - बाहर के बावन में मत उलझो, अंदर के एक अक्षर(नाम) को खोज लो ।
२. दूसरा अर्थ - शरीर के ५२ बंधन : संत-वाणी में शरीर को बंधनों का घर कहा है । मोटे तौर पर गिनें तो - 
५ ज्ञान इंद्रिय + ५ कर्म इंद्रिय + ५ तत्व + ५ तन्मात्रा + मन + बुद्धि + चित्त + अहंकार = २४
५ मुख्य प्राण (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान) + ५ उप-प्राण (नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय) = १०
३ शरीर के बंधन - स्थूल, सूक्ष्म, कारण + ३ गुण - सत, रज, तम = ६
६ विकार - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर + ६ अवस्थाएं - भूख, प्यास, शोक, मोह, जन्म, मृत्यु = १२
इसीलिए कहते हैं - "कहि जगजीवन नांव भजि" - इन बंधनों को काटने का एक ही उपाय है, नाम भजन । जैसे ही नाम की धारा अंदर जागती है, ये सारे बंधन ढीले पड़ जाते हैं ।)
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पवन पिंगला१ रवि तपै, चन्द्र पंगुला२ मन ।
कहि जगजीवन मद्धि घर, राम रटै निज जन ॥६४॥
(१. पिंगला=दक्षिण भाग की नाड़ी । २. पंगुला=इड़ा नाड़ी)
पिंगला नाड़ी में सूर्य जैसा पवन तपता है और इड़ा नाड़ी चंद्रमा जैसी शीतल है, जगजीवन जी महाराज कहते हैं ज्ञानी जन इनके मध्य घर में राम को रटता है ।
(क्रमशः) 

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