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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*मना ! जप राम नाम लीजे,*
*साधु संगति सुमिर सुमिर, रसना रस पीजै ॥*
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दादूजी के दरबार रहिये जनम भरि,
तोहू काहू बात की कमी न दीखे काई जी ।
तुमको संतोष वे को विधना संवारी आप,
छाजन भोजन करि सर्व सुखदाईजी ॥
हमतो दर्श देखि अति ही निहाल भये,
और अब कहा कहैं मुख से बनाई जी ।
बार बार कर जोरि बीनती करत राजि,
सुन्दर को हंसिकर सीख दीजे बाईजी ॥४॥
उक्त मनहर में बाईजी के समय में नारायणा दादूधाम में संतों को जो अनुकूलतायें थीं, उनका प्रदर्शन करते हुए, बाईजी के कार्य और विचारों से प्रसन्न होकर सुन्दरदासजी नारायणा दादूधाम से विचरने के लिए बाईजी से आज्ञा मांग रहे हैं ॥
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इन्दव –
पीछे तुम्हार हि आय मिलै सब छाजन भोजन जे कछु कीजे ।
आदर मान सबै विधि पाइये नाम तुम्हारो जहां तहां लीजे ॥
बार हि बार कहा तुमसे कहैं सुन्दर की अरदास सुनीजे ।
चित्त हमारो भयो रमि वे करि बाईजी वेगि रजा मोहि दीजे ॥५॥
उक्त इन्दव में बाईजी का प्रभाव बताते हुए जाने की आज्ञा मांग रहे हैं ।
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जे तक द्यौस रहे दरबार में जानत हैं बड़ भाग हमारो ।
जैसी तुम्हारी कृपा हम ऊपर तैसी सदाहि रहो इक सारो ।
मारग चालत होत परिश्रम आबत जात अत्यन्त उन्हारो ।
सुन्दरदास कहै कर जोर जु, बाईजी आयुस पाऊं तुम्हारो ॥६॥
उक्त इन्दव में बाईजी का अपने प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हुये तथा अधिक उष्णकाल आ रहा है मार्ग चलने में अति परिश्रम होगा । यह कह कर जाने की आज्ञा शीघ्र मांग रहे हैं ।
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उक्त सवैया सप्तक से सभाकुमारी बाईजी का महत्व प्रकट होता है । सुन्दरदासजी जैसे महान् संतों के ह्रदय में भी सभाकुमारी(रामकुमारी) जी के प्रति कितना आदर है, यह उक्त सप्तक से सूचित हो जाता है । रूपकुमारीजी(श्याम कुमारी) जी बहुत कम बोलती थीं । वह ब्रह्म भजन में लीन रहती थीं । दोनों साथ रहने से जब भी बोलने का प्रसंग आता था तब सभाकुमारीजी बोला करती थीं ।
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राघवदासजी ने भी अपनी भक्तमाल में युगल बाइयों के विषय में दो मनहर दिए हैं, वे भी यहां दिए जाते हैं । उनसे भी ज्ञात होगा कि बाइयों का समाज में कैसा समादर था~
दादूजी के पाट को प्रताप देख्यो दशों दिशि,
रामा श्यामा बाई राजे दोउ ओर चढती ।
दर्शन को आवें संत महन्त प्रवीन१ दीन,
आतमा अनन्त दीसे जै जै कार पढ़ती ।
निरंजन निराकार अलख अपरंपार,
ऐसे रहे रात दिन राम राम रटती ।
राघो कहै ऋद्धि सिद्धि छाजन२ भोजन यश,
जानराय कीन्ही जान सर्व बात बढ़ती ॥४८२॥
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दादूजी की गद्दी का प्रताप उस समय दशों दिशाओं में फैला हुआ देखा जाता था । दादूजी की गद्दी के दोनों ओर रामा(रामकुमारी) और श्यामा(श्याम कुमारी) दोनों बाई बैठी हुई दिखाई देती थीं । एक और रामकुमारीजी और दूसरी ओर श्यामकुमारीजी का दर्शन होता था । (ये उस बीच के समय में ही बैठती थीं जब केवलदासजी ने गद्दी छोड़ी और मसकीनदासजी नहीं बैठे थे) । दोनों बाईजी ध्यान तथा ज्ञान दोनों ही दिशाओं में बढ़ती हुई संतों को ज्ञात होती थीं ।
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दोनों बाईजी के दर्शन करने-सन्त,महन्त, विद्वान१ तथा दीन गरीब सभी आते थे । उनके पास जय ध्वनि करती हुई अनेक आत्मायें देखि जाती थीं । दोनों बाईजी निरंजन, निराकार, अलख और अपरंपार ब्रह्म का नाम रात दिन रटते हुये प्रभु-प्रेम में ऐसे निमग्न रहती थीं, जैसे जल में मछली । राघवदासजी कहते हैं- दोनों बाईयों के पास ऋद्धि, सिद्धि, वस्त्र२, भजन आदि की कुछ भी कमी नहीं रहती थी । जानराय भगवान् ने उनकी अवस्था जानकर उनकी सर्व बातों में वृद्धि कर दी थी और उनका सुन्दर यश भी बढ़ा दिया था ।
(क्रमशः)

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