शनिवार, 5 सितंबर 2026

*अथ अध्याय ५ =*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*प्रेम भक्ति दिन दिन बधै, सोई ज्ञान विचार ।*
*दादू आतम शोध कर, मथ कर काढ़या सार ॥*
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*अथ अध्याय ५ =*
*८ वें आचार्य निर्भयरामजी की शिष्य परंपरा =*
आचार्य निर्भयरामजी के शिष्य चरणदासजी की परंपरा इस प्रकार है~
१~ चरणदासजी पुजारी, २~ लालदासजी, ३~सुखरामजी पुजारी, ४~ साहिबरामजी, ५~ लायकरामजी, ६~ आत्मारामजी, ७~ वन्नादासजी वर्तमान हैं । इनके सुयोग शिष्य पूर्णदासजी भी अच्छे संत हैं । १~ चरणदासजी प्रसिद्ध संत तथा पुजारी थे । ८~ सुखरामजी मान्यता प्राप्त पुजारी हुये हैं ।
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आचार्य निर्भयरामजी के खालसे का दूसरा स्थान-नारायणा में है । इसमें रामदयालदासजी वि. सं. १८५१ में थे, उनके हरविलासदासजी । आगे इस स्थान की प्रणाली अप्राप्त है । तीसरा स्थान नारायणा में केशवरामजी वि. सं. १८९१ में थे । आगे इस स्थान की प्रणाली भी अप्राप्त है । चौथा स्थान-तुलसीदासजी वि. सं. १९०८ में थे । उनके तोतारामजी हुये । आगे इस स्थान की भी प्रणाली प्राप्त नहीं हो रही है ।
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निर्भयरामजी महाराज के खालसे की एक चरणदासजी की प्रणाली चल रही है । इनका एक स्थान नारायणा ग्राम में कुंड के पास सुखरामदासजी वाला स्थान है । नारायणा के खाख चौक में तालाब के किनारे पुजारी चरणदासजी की बगीची भी विद्यमान है । पुजारी सुखरामदासजी ने कुंडवाली हवेली तथा अपनी सभी संपत्ति दादू पंथ के वर्तमान आचार्य को भेंट कर दी थी । खाख चौक की बगीची भी आचार्यजी को भेंट कर दी थी । इस परंपरा में चरणदासजी पुजारी तथा सुखरामदास जी पुजारी दोनों अच्छे महात्मा हो गये हैं । अन्य संत भी भजनानन्दी ही हुये हैं ।
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९ वें आचार्य जीवणदासजी महाराज के खालसे का अब कोई स्थान नहीं है और पूर्व का विवरण भी नहीं मिल रहा है । आप गादी पर ६ वर्ष विराजे थे । अतः आपने अधिक शिष्य भी नहीं किये हों तथा आप परम विरक्त भजनानन्दी थे । अतः शिष्य करना भी नहीं चाहते होंगे । कोई भी कारण हो । आपके खालसे के स्थान अब नहीं हैं ।
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१० वें आचार्य दिलेरामजी महाराज के खालसे में भी अब कोई स्थान शेष नहीं है तथा पूर्व का विवरण भी नहीं मिल सका है । दिलेरामजी महाराज ने अपना उत्तराधिकारी अपने ज्येष्ठ शिष्य रामबगसजी को बनाया था किन्त्तु वे गद्दी पर केवल १७ दिन विराजकर विरक्त होने से गद्दी छोड़कर विचर गये थे । उनका स्थान हरमाड़ा ग्राम में है । वे हरमाड़ा में रहने लग गये थे । उस स्थान को दादूद्वारा अस्थल से बोलते थे । यह स्थान हरमाड़ा ग्राम के बीच में है । स्थान के नीचे दुकानें भी हैं । एक मकान और एक दुकान अलग भी है ।
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कृषि योग्य भूमि और कुंआ भी था किन्तु अब स्थान में कोई साधु नहीं है । इस स्थान के अन्तिम उत्तराधिकारी रामरसदासजी हुये हैं । यह स्थान अच्छा प्रतिष्ठित था । ग्राम के ठाकुर व बस्ती इस पर पूर्ण श्रद्धा रखती थी । कारण यहां निवास करके परम विरक्त रामबागसजी महाराज ने भजन किया था और उनकी शिष्य परंपरा के संत भी भजनानन्दी होते रहे होंगे । अतः भजनानन्दी संतों का आश्रम होने से सबकी श्रद्धा थी किन्तु अब स्थान समाप्त है ।
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११ वें आचार्य प्रेमदासजी महाराज के खालसे के स्थान भी अब नहीं हैं और पूर्व का विवरण कुछ नहीं मिल सका है ।
(क्रमशः)

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