शनिवार, 5 सितंबर 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~६१/६४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~६१/६४*
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*कुल साँकल काया कड़ी, लोहा में सु विशेष ।*
*रज्जब प्रभु पारस परसि, कचंन होत सु देख ॥६१॥*
जैसे लोहे की साँकल में लोहे की कङियां विशेष रूप से लगी रहती हैं, किन्तु देख, पारस का स्पर्श होते ही सुवर्ण हो जाता है, वैसे ही कुल में विशेष रूप से शरीर फँसा है, किन्तु भजन द्वारा प्रभु की प्राप्ति होते ही कुल और शरीर का अध्यास जाता रहता है ।
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*राम नाम की गर्ज सुन, बधै वंश ज्यों भाव ।*
*रज्जब रीझ्या देखकर, अति आतुर गति चाव ॥६२॥*
जैसे बादल की गर्जना सुनकर बाँस बढ़ता है, वैसे ही राम-नाम की ध्वनी सुनकर भाव बढ़ता है उत्साह और आतुरतापूर्वक शीध्र गति से जो भाव बढ़ता है उसे देख कर हम अति प्रसन्न हैं ।
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*आतम फल आतुर उदय, तथा आँवली राति ।*
*रज्जब अज्जब देखिये, इस अंकुर की जाति ॥६३॥*
जैसे आमला के भादू के कृष्ण पक्ष की एक ही अंधेरी रात्रि में एक साथ ही सब फल आ जाते हैं, वैसे ही अन्त:करण में भजन का फल शीध्रता से एक साथ उदय हो जाता है, इस आमला और भजन रूप अंकुर की जाति ऐसी अदभुत देखी जाती है ।
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*एक आदमी आँवलनि, फल पावे तत्काल ।*
*अन्य सु अठारह भार नर, सहज सु फल सुन साल१ ॥६४॥*
एक भजनानन्दी मनुष्य तो ऐसा होता है कि उसे आमलिन के समान तत्काल ही फल मिल जाता है और सुनो, अन्य मनुष्य अठारह भार वनस्पतियों के समान है, जैसे अन्य वनस्पतियों के वर्ष१ भर में कोई के कब, कोई के कब शनै: शनै: फल लगता है, वैसे ही उन मनुष्यों को अपने कर्म का शनै:शनै: फल मिलता है ।
(क्रमशः) 

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