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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ६९/७२*
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नित अध्यातम नाम रत, काम क्रोध तजि एह ।
कहि जगजीवन हरि भगत, हरि मंहि राखै देह ॥६९॥
जो नित्य अध्यात्म और नाम में रत रहता है और काम-क्रोध को छोड़ देता है, वही हरि-भक्त अपनी देह को हरि में रखता है ।
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नौ खिड़की११ ताला जड़ै, दसमी पोलि निकास१२ ।
हरि मारग लहै राम घर, सु कहि जगजीवनदास ॥७०॥
(११. नौ खिड़की=नव द्वार बंद कर) (१२. दसमी पोलि निकास=दशम द्वार खोलना)
शरीर की नौ खिड़कियों, नौ द्वारों पर ताला लगा दो और दसवें द्वार को खोलो । जो सातों को दृढ़ता से बंद करके दसवें में प्रवेश कर निकल जाता है, उसने राम का नाम रट कर अपना किला सजा लिया ।
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सात उभै गाढ़ा जड़ै, दसमैं पैठि निकास ।
तिहिं गढ़ सज्यौ राम रटि, सु कहि जगजीवनदास ॥७१॥
शरीर में नौ खिड़कियाँ हैं - दो आँख, दो कान, दो नाक, मुख, गुदा और इंद्रिय - इन नौ द्वारों पर ताला जड़ दो, यानी इनको बाहर की ओर जाना बंद कर दो । और दसवीं जो पोल है - दसवाँ द्वार, जो सिर के भीतर गगन-मंडल में है - उससे निकल जाओ । वही हरि का मार्ग है, वही राम का घर है, ऐसा जगजीवन दास कहते हैं ।
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दुनियां मांही दुइ सरग१३, देव असुर बिसतार ।
कहि जगजीवन हरि भजि सुलझै उलझै मैंमत१४ मार ॥७२॥
(१३. सरग=सृष्टि) (१४. मैंमत=अभिमान)
जगजीवन जी कहते हैं, दुनिया में दो ही सृष्टि हैं - देव और असुर का विस्तार। हरि को भजने से ये उलझन सुलझ जाती है और अहंकार में उलझने से जीव मारा जाता है ।
(क्रमशः)

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