🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सूधा मारग साच का, साचा होइ सो जाइ ।*
*झूठा कोइ न चलै, दादू दिया दिखाइ ॥*
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*संत दूलजी*
संत दूलजी का समय लगभग वि . सं . १८८५ से १९७४ तक है । आप बाईजी रामकुमारीजी की परम्परा में महलकां महन्तों के अतीत(छुट भाइयों में) में थे । शरीर से हृष्ट पुष्ट तेजस्वी संत थे । नारायणा दादूधाम में खेजड़ाजी के स्थान पर प्रह्लादजी की शाल के बाहर बालकों को निःशुल्क पढ़ाया करते थे ।
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उस समय काष्ठ के पाटों पर मुरड़(श्वेत) मिट्टी पोत कर उसके सूख जाने पर खोर(लाल ईंट की मिट्टी) बिछाकर पराश वृक्ष की टहनियों को पैंसिल नुमा बनाकर उक्त पाटे पर अक्षर लिखाये जाते थे । पढ़ाते समय पास में एक लम्बा वांस रखते थे । उस वांस से आप बैठे ही जिस बच्चे का प्रमाद देखते उसे सचेत करते थे । अक्षर ज्ञान प्राप्त हो जाने पर दादूपंथी संतों के शिष्यों को दादूवाणी, सुन्दरविलासादि ग्रंथ भी पढ़ाया करते थे ।
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प्रति दिन खेजड़ा के आस पास की भूमि पर बुहारी निकालकर साफ रखते थे । आपके अंतिम दिनों की एक घटना भी विचित्र है, वह देखिये । यह आचार्य दयारामजी महाराज के समय की है । उन दिनों में दूलजी तालाव की पाल वाले महलकां वाल महन्तों के मकान के नीचे शाल में निवास करते थे । आप इससे पूर्व हर व्यक्ति को सीधी खाने या बिना परिश्रम मिलने वाली बात के प्रसंग में कहते थे—
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"भाया सीधी सनेती पर सोवाला हो" । तब सुनने वाले लोक कहते थे कि— "बाबाजी हम क्या सभी और आप भी सीधी सनेती पर सोवेंगे" तब संत दूलजी कहते थे- "नहीं भाया मैं तो म्हारी सनेती बांधकर उस पर सोकर ही मरूंला । जैसा वे कहते थे वैसा ही उन्होंने किया भी था । आपने अपनी मृत्यु के समय के दिन से पहले ही सब सामग्री तैयार करली थी । संस्कार के योग्य छोटी मोटी सभी वस्तुयें लाकर शाल में रख दी थी ।
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सनेती बांध कर खड़ी कर दी थी । कफन भी उस पर रख दिया था । लकड़ियां अपने कंधे पर लेजा लेजाकर श्मशान में डाल आये थे । स्नान के लिये जल का घड़ा भरकर रख दिया था । एक थैली में टक्के पैसे भी रख दिये थे, मृत्यु के कुछ समय पूर्व ही दादूमंदिर में जाकर दंडवत की फिर आचार्य दयारामजी महाराज के पास बारहदरी में गये । उनको दंडवत सत्यराम करके तथा हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि महाराज, मेरा राम का शरीर अब थोड़ी ही देर में छूटने वाला है ।
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अन्तिम संस्कार के लिये मैंने सब तैयारी कर दी है, अब जाकर स्नान करके शरीर को छोड़ दूंगा । अतः आप चार साधुओं को भेजदें । वे श्मशान में पहुँचाकर देह को जला आयेंगे । आचार्य दयारामजी ने कहा— अभी तो आप का शरीर ठीक है, ऐसा क्यों कह रहे हैं ? संत दूलजी ने कहा— महाराज ! मैं सत्य ही कह रहा हूँ । ऐसा कहकर दूलजी अपने निवास स्थान पर आये और स्नान करके कफन की चादर ओढ़ अविचल मंत्र का जप करते हुये सनेती पर सो गये और उसी क्षण ब्रह्मलीन हो गये ।
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आपके जीवन में यह भी एक नियम रहा था कि किसी व्यक्ति के मरने की खबर सुनते तो उसके दाह संस्कार में अवश्य जाते थे और चिता आदि की सब विधि स्वयं करते थे । थोड़ी देर के पश्चात् आचार्य दयारामजी महाराज ने एक साधु को कहा- दूलजी के पास जाओ और देखकर आओ कि वे क्या कर रहे हैं? साधु ने जाकर देखा तो ज्ञात हुआ वे तो सनेती पर सोये हुये हैं और शरीर को छोड़ चुके हैं ।
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फिर सब संतों ने तथा भक्तों ने उनका देह शमशान में ले जाकर दाह संस्कार किया । उनके देहान्त के दिन मैं भी नारायणा दादूधाम में ही था ।
कहा भी है-
"संत न पर दुःख सह सके, आप करैं निज काम ।
दूलदास काष्ठादि भी, धरे दाग के धाम ॥१६१॥ह.त.१२॥
(क्रमशः)

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