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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ८१/८४*
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कहि जगजीवन पालती१०, खेती करै किसान ।
प्रेम नीर बीरज भगति, वपु महिं जांनै जांन ॥८१॥
(१०. पालती=खेत में काम करने वाला)
संत जगजीवन जी कहते हैं, जैसे खेत में पालती मजदूर काम करता है और किसान खेती करता है, वैसे ही यह शरीर एक खेत है । इसमें प्रेम रूपी जल से भक्ति रूपी बीज बोना चाहिए । जो ज्ञानी है, वह इस रहस्य को अपने शरीर के अंदर ही जानता है ।
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सात पांच नौ तीन लहै, दस दोइ रवि प्रकास ।
षट अरु षट रस रांम धरि, सुकहि जगजीवनदास ॥८२॥
सात धातु, पांच प्राण, नौ द्वार और तीन गुण - इन सब में वही बसा है । दसवां द्वार और दो आँखों में सूर्य का प्रकाश भी वही है । छह शास्त्र और छह रस सब में राम को ही धारण करो, यही वार्ता संत जगजीवन दास जी सुखद वाणी में कहते हैं ।
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श्रवण नेत्र मुख नासिका, जिभ्या इन्द्री बंधि ।
कहि जगजीवन रांम रटि, लहै नांऊँ सुर संधि ॥८३॥
कान, आँख, मुख, नाक, जीभ - इन पाँचों ज्ञान इन्द्रियों को वश में बाँध कर जो राम नाम रटता है, संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि वह सुरों की संधि को - अर्थात सुरत को शब्द से जोड़ने वाली दिव्य धुन को पा लेता है ।
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सुध सिधांत१ सुणन की, सिद्ध साधिक की बांणि२ ।
कहि जगजीवन रांम रटि, रांमहि लेइ पिछांणि ॥८४॥
(१. सुध सिधांत=शिव प्रोक्त योगशास्त्र के प्रसिद्ध सिद्धांत)
{२. बांणि=प्रकृति(आदत=स्वभाव)}
शुद्ध सिद्धांत सुनने की आदत सिद्ध और साधकों का स्वभाव है । पर संत जगजीवन साहब कहते हैं, सब सुन-सुन कर अंत में राम नाम रट कर राम को ही पहचान लेना चाहिए ।
(क्रमशः)

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