🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू सोई हमारा सांइयां, जे सबका पूरणहार ।*
*दादू जीवन मरण का, जाके हाथ विचार ॥*
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फिर संत भक्तरामजी कोलायत तीर्थ की ओर चले गये थे । वहां जागेरी तलाई से कुछ दूर एक गुफा में बहुत समय तक भजन किया था । भक्तरामजी बहुत उच्चकोटि के योगी महात्मा थे । बीकानेर नरेश को ज्ञात हुआ कि आजकल भक्तरामजी महाराज जागेरी तलाई के पास की गुफा में भजन करते हैं । तब राजा एक दिन उनके दर्शन करने वहां गये ।
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राजा को भक्तरामजी के दर्शन से महान् आनन्द प्राप्त हुआ । थोड़ी देर सत्संग चर्चा करने के पश्चात् राजा ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की- भगवन् ! सेवा की आज्ञा दीजिये । भक्तरामजी ने कहा- भगवत् कृपा से सब आनन्द है । फिर राजा ने आग्रह पूर्वक कहा- स्वामिन् ! सेवक को सेवा अवश्य बताइये । भक्तरामजी ने कहा- हम बतायेंगे वह सेवा आप करने में अच्छा नहीं मानेंगे ।
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राजा ने कहा- नहीं महाराज ! अयोग्य सेवा तो संत बताते ही नहीं हैं । योग्य सेवा मेरे करने योग्य होगी और जिसको मैं कर सकता हूं वह अवश्य करूंगा आप अवश्य आज्ञा दें । भक्तरामजी ने कहा- "अच्छा तो लो बता देता हूं । आज से पीछे फिर मेरे पास आप नहीं आना यही हमारी सबसे बड़ी सेवा है ।" राजा भक्तरामजी की बात सुनकर कुछ क्षण मौन रहा फिर हाथ जोड़ कर बोला- मैं तो आपकी आज्ञा अवश्य मानूंगा किन्तु इससे आपका क्या आशय है ? यह भी कृपा करके समझा दें जिससे मेरे हृदय की ग्लानि मिट जाय ।
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भक्तरामजी ने कहा- मेरा आशय है- आपके बारंबार आने से मेरे भजन में विघ्न होगा । देश का राजा जिस संत के पास श्रद्धा से बारंबार जाता है तब उसकी प्रजा भी बहुत आने लगती है और लोगों के बहुत आने जाने से भजन में पूर्ण विघ्न होता है । राजा भक्तरामजी की बात सुनकर समझ गया कि- ये विरक्त संत हैं । इनको लोगों का आना जाना अवश्य ही विघ्न रूप भासता है । अतः इनका कहना सर्वथा उचित ही है ।
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फिर राजा प्रणाम करके बोला- आपकी आज्ञानुसार ही करूंगा । इसमें कुछ भी प्रमाद नहीं करूंगा फिर प्रणाम करके राजा साथियों सहित चला गया ।
कहा भी है-
आश हीन वर भक्त को, जन सम्पर्क न भाय ।
भक्तराम ने भूप से, कहा फिर न इह आय ॥४६६॥ह.त. ९॥
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अंतिम दिनों में एक दिन भक्तरामजी जहां बैठे थे वहां से सहसा उठकर भी लगभग पचास भक्त थे वे भी चल दिये । कानासर के वन में एक टीले के उत्तर की ओर चल दिये । उस समय उनके साथ-विवेकनाथ, सम्पन्ननाथ और पास जाकर सब से बोले "अब हमारे शरीर के त्याग का समय आ गया है. तुम सब यहां ही रुक जाओ आगे मत आओ ।" उक्त वचन सुनकर सब रुक गये । संत भक्तरामजी टीले की उतराई में एक कैर के वृक्ष के पास गये ।
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थोड़ी ही देर में कैर के पास एक शब्द हुआ । तब दोनों नाय संत समझ गये कि कपाल(ब्रह्मरंध्र) भेदन का शब्द हुआ है, अब शरीर त्याग दिया है । फिर वे सब दौड़कर टीले पर चढ़ और शव को भी देख लिया किन्तु उन लोगों के शव के पास पहुँचने से पहले ही आकाश से एक विशाल पक्षी उतरा और शव को उठाकर आकाश में ही ऊंचा चढकर अदृश्य हो गया ।
कहा भी है-
"संत जनों का प्रयाण भी विचित्र ढंग से होय ।
भक्तराम तन तजत ही, पक्षि ले गया सोय ॥१८१८.त.१३॥
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समाधि बनाने के लिए भक्तरामजी निषेध कर गए थे । किन्तु फिर भी उनके भक्त लोग श्रद्धा पूर्वक उस स्थान पर जाते रहते हैं । बीकानेर में सदाणियों के मंदिर के पीछे एक ब्राह्मण के घर में उनकी तस्वीर स्मृति चिन्ह अभी तक है । भक्तरामजी का निर्वाण दिन वि. सं. १९२४ पोष पूर्णिमा है । बीकानेर के दादू पंथी लालदासजी ने भक्तरामजी के चरण अपने स्थान में वि. सं. १९७७ आषाढ़ पूणिमा को पधराये थे सो वहां छत्री में विद्यमान हैं ।
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*रामसुखदासजी*
रामसुखदासजी बाईजी के थांभे के थे । रामगढ़ शहर में दीक्षित हुये थे । आप अच्छे विद्वान संत थे । पंडित रामशरणजी महाराज के साथ आपका अनेक बार संस्कृत में शास्त्रार्थ चला करता था । आपका शरीर वि.सं.१९६० तक धरातल पर था । आप अच्छे विद्वान संत थे ।
(क्रमशः)

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