बुधवार, 30 सितंबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ८५/८८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ८५/८८*
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ए ही गोरख भरथरी, ए ही संकर दत्त ।   
कहि जगजीवन रांम रटि, जे रहैं रांम सौं रत्त ॥८५॥
जो भी राम के रंग में रंगा रहता है और राम नाम रटता है, वही सच्चा गोरख है, वही भरथरी है, वही शंकर और वही दत्तात्रेय है । जगजीवन साहब कहते हैं कि जाति-वेश से नहीं, राम से प्रेम में ही जीव महापुरुष बनता है ।
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मूल चक्र मन मांहि हरि. इन्द्री चक्र अगाध ।
नाभि चक्र बिसतरि बस्त, हरि हरि सुमिरैं साध ॥८६॥
संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि मूलाधार चक्र में मन को लगा कर हरि को देखो, स्वाधिष्ठान जो इन्द्रियों का अगाध चक्र है, और नाभि चक्र में जो सृष्टि का विस्तार बसा है - इन सब में साधु जन हरि-हरि का ही सुमिरन करते हैं ।
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रिदा चक्र मंहि रांमजी, कंठ चक्र रस बाधि ।
कहि जगजीवन भ्रुवों चक्र मांहि, परम जोति घर लाधि ॥८७॥
हृदय चक्र में राम जी का वास है, कंठ चक्र में भक्ति के रस को बाँधो, और संत जगजीवन जी कहते हैं कि दोनों भौंहों के बीच वाले आज्ञा चक्र में ही परम ज्योति का घर मिल जाता है ।
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ए षट चक्र सिद्धांत सिधि३, बिरह अगनि तन दाधि४ ।
कहि जगजीवन जन मिलै, अबिगत कौं आराधि ॥८८॥
(३.सिद्धांत सिधि=योगशास्त्र पर प्रसिद्ध ग्रन्थ सिद्धसिद्धान्तपद्धिति)
(४. दाधि=जल कर)
ये छहों चक्र सिद्ध-सिद्धान्त-पद्धति ग्रन्थ का सार हैं । जो इनमें विरह की अग्नि से तन को जला देता है - अर्थात तपाता है, संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि - वही जन अवगत - उस अगम्य राम की आराधना कर के उससे मिल पाता है ।
(क्रमशः) 

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