बुधवार, 30 सितंबर 2026

*सिद्ध संत अलखरामजी*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*साचा सांई शोध कर, साचा राखी भाव ।*
*दादू साचा नाम ले, साचे मारग आव ॥*
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*संत सुखरामजी*
फिर जैसा सिद्ध संत ने क्षेमदासजी को कहा था- तुम्हारे शिष्य तथा पौत्र शिष्य सिद्ध संत होंगे। उनके कथनानुसार ही क्षेमदासजी के शिष्य सुखरामजी सिद्ध संत ही हुये । क्षेमदासजी का देहान्त वि. सं. १७९७ में हो गया और उनकी गद्दी पर सुखरामजी महाराज विराजे । उनकी उस प्रदेश में अच्छी प्रतिष्ठा हुई । उनको मानने वाले भक्तों की भी संख्या बहुत हो गयी थी । आपके साधन भजन के द्वारा आपकी कीर्ति दूर दूर तक फैल गई थी ।
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खंडेला नरेश वृन्दावनदास के पुत्र नहीं होता था, इससे वे बहुत व्यथित रहते थे । उन्होंने संत सुखरामजी की महिमा सुनी तब अपनी अभिलाषा पूति के लिये वे संत सुखरामजी के पास चौकड़ी की डूंगरी पर आये और मर्यादा पूर्वक प्रमाणादि करके हाथ जोड़े हुये सामने बैठे गये और अवकाश देखकर सुखरामजी से प्रार्थना की- भगवन् ! मेरे पुत्र नहीं है इससे मैं व्यथित रहता हूं और इस अभाव की पूति के लिये ही आपके पास आया हूं आप तो सर्व हितैषी संत हैं । अतः मुझे आशा है मेरी इच्छा आप अवश्य पूरी कर देंगे । 
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सुखरामजी ने उनको पुत्र होने का वर दे दिया । फिर उस वर से धीरज का जन्म हुआ । पुत्र प्राप्ति पर खंडेला नरेश वृन्दावनदास ने दो कृषि भूमि युक्त कूप भेंट किये । एक दूधवालों के बास में और एक नागल बैपुस में दिया तथा वैसे भी वे आपकी सेवा अनेक समय किया करते थे। उस समय सुखरामजी की शेखावाटी में बहुत प्रतिष्ठा थी और सुखरामजी महान् संत थे । उनका मन ब्रह्म भजन में ही प्रायः रहता था। सुखरामजी के शिष्य अलखारामजी हुये । सुखरामजी वि. सं. १८२७ श्रावण सुदि १२ गुरुवार को ब्रह्मलीन हुये थे ।
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*सिद्ध संत अलखरामजी*
सुखरामजी की गद्दी पर उनके शिष्य अलखरामजी विराजे । ये महान् सिद्ध संत हुये । अलखरामजी के समय से वह डूंगरी अलखरामजी की ही कहलाने लग गई है और अब तक अलखरामजी की ही कहलाती है । सारी पहाड़ी पर ही स्थान बना हुआ है । वह महान तपोभूमि है । अभी भी वहां की मर्यादा पूर्वक सेवा पूजा होती है । 
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खेतड़ी नरेश अमरसिंह के भोजन करने का रत्नजटित स्वर्णथाल खोया गया था । नरेश ने उसका पता लगाने का बहुत प्रयत्न किया किन्तु उसका कुछ भी पता नहीं लगा । उसका पता लगाने के लिए उसने सोचा अलखरामजी महाराज सिद्ध पुरुष हैं । अतः उनके पास जाने से पता लग सकता है । फिर वे अलखरामजी के पास डूंगरी पर गये और श्रद्धा पूर्वक प्रार्थना करके उनको खेतड़ी लाये । 
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पांच दिन तक अलखरामजी के पास बैठ कर सत्संग करते रहे । छठे दिन अमरसिंह का मुख मंडल उदास देखकर अलखरामजी ने पूछा- "राजन् ! आज आपका मुख उदास क्यों है ? क्या सोच रहे हो ? सत्य कहो ।" खेतड़ी नरेश ने कहा- भगवन् ! मेरे भोजन करने का रत्न जटित स्वर्णथाल खोया गया । उसका पता लगाने का बहुत यत्न भी किया किन्तु उसका कुछ भी पता नहीं लगा । उसे याद कर मेरे मन में यह विचार प्रकट हुआ कि जब मेरे थाल का भी मैं पता नहीं लगा सका तब प्रजा की वस्तुयें कहीं खोई जायें उनका पता क्या लगा सकूंगा ? यह सोच करके ही मेरा मुख उदास है । 
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राजा की उक्त बात सुनकर अलखरामजी कुछ मौन रहे फिर बोले- राजन् ! चिन्ता मत करो थाल तो राज भवन में ही है । यह मैंने अपनी योगशक्ति से जान लिया है । राजा ने पूछा कहां है ? अलखरामजी ने कहा- राजभवन में जो कूप है उसमें पड़ा है । चुराने वाली ने भय के मारे डाल दिया था । फिर उसी क्षण अपनी योगशक्ति से कूप से निकालकर जल से भरा थाल राजा के सम्मुख रख दिया । उसे देखकर राजा को अति आश्चर्य हुआ । फिर उसके मन में संशय हुआ यह कूप से आया है इसमें क्या प्रमाण । 
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उसका निश्चय करने के लिये राजा विचार कर रहे थे कि उन्हें स्मरण आया कि एक दिन स्मरण करने की मेरी माला भी कूप में पड़ गई थी । यदि वह भी मेरे पास आ जाय तो मुझे निश्चय हो जायगा कि यह थाल भी कूप से आया है । अलखरामजी महान् योगीराज थे, राजा के मन की बात उसी क्षण जान गये । फिर राजा ने कहा — महाराज मेरी स्मरण करने की माला भी कूप में गिर गई थी । उसे भी मंगवा दीजिये । अलखरामजी ने कहा — तुम्हारी स्मरणी तुम्हारी जेब में देखो । 
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राजा ने जेब में देखी तो वह स्मरणी जो कूप में गिरी थी जेब में मिल गई । फिर राजा के आश्चर्य और आनन्द की सीमा भी नहीं रही अर्थात् अति आश्चर्य और आनन्द हुआ  ।फिर तो खेतड़ी नरेश अमरसिंह की सिद्ध संत अलखरामजी महाराज पर बहुत श्रद्धा हो गई । फिर राजा ने अलखरामजी की इच्छानुसार अलखरामजी की डूंगरी पर अच्छा मन्दिर बनवाया और इस डूंगरी के मन्दिर के तीसरे मंजिल पर चेतनदासजी तथा क्षेमदासजी की स्मारक छत्री बनवाई । 
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वह मन्दिर अब भी अच्छी स्थिति में है । खेतड़ी नरेश ने स्थान की सेवा के लिये सात कूप कृषि के योग्य भूमि वाले अलखरामजी के भेंट किये और वैसे भी राजा अमरसिंह अपने जीवनकाल में डूंगरी के मन्दिर की व वहां के संतों की सेवा करते ही रहते थे । चौकड़ी के ठाकुर भक्तसिंह के पुत्र जवानीसिंह के पुत्र नहीं हुआ था । इससे उन्होंने अलखरामजी से प्रार्थना की । फिर सिद्ध संत अलखरामजी ने उनको पुत्र प्राप्ति का वर देकर प्रसन्न किया था । 
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अलखरामजी के वर से उनके अर्जुनसिंह और भीमसिंह दो पुत्र हुये । अपनी अभिलाषा पूर्ण होने से प्रसन्न होकर चौकड़ी ठाकुर साहब ने अलखरामजी महाराज के ३५१ बीघा भूमि भेंट की थी और भी सेवा करते ही रहते थे । अलखरामजी महाराज दादूवाणी का विचार करते ही रहते थे । उस वाणी द्वारा बताई गई साधन पद्धति से वे सिद्धावस्था को प्राप्त हुये थे । उनकी दिव्य दृष्टि हो गई थी । सिद्धियां प्राप्त होने पर भी वे निर्गुण ब्रह्म की भक्ति में ही संलग्न रहते थे तथा जिज्ञासु साधकों को उपदेश भी करते थे ।
(क्रमशः)

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