मंगलवार, 22 सितंबर 2026

युगलबाईजी की भेंट के सवैये

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ ।*
*दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥*
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*युगलबाईजी की भेंट के सवैये =* 
अब युगलबाईजी पर छोटे सुन्दरदासजी की श्रद्धा का परिचय देते हैं, देखिये~ मनहर~
दादूजी के पीछे तो चलाई है गरीबदास, 
ताके पीछे बाईजी चलावत है चौगनी । 
जोई आवे भेट भाव कोउ लेहु कोई खाय, 
राखिये को नाहीं चाव देने ही की सुनी ॥ 
अति ही गंभीर धीर शीतल ज्यों गंगनीर, 
पायो है जु पुरो पीर परम महामुनी । 
सुन्दर विराजै जोर दरबार दोउ ओर, 
संत बैठे-ठौर ठौर दर्शन करे दुनी ॥१॥ 
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उक्त मनहर से ध्वनित होता है कि गरीबदासजी के शिष्य केवलरामजी ने जब गद्दी त्याग दी थी तब बाईजी ने गरीबदासजी से भी चौगनी आचार्य की रीति नीति का निर्वाह किया था । आप गद्दी के बराबर बैठ कर आचार्य का सब कार्य करती रहीं थीं । जब संतों का दरबार लगता था तब गद्दी के दोनों ओर बाइयां बैठकर समाज सम्बन्धी सब विचार किया करती थीं और सबको आचार्य के समान ही आज्ञा देकर समाज को स्थिर रखा था । 
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भगति मुकती भरपूर है भंडार मांहीं, 
रिद्धि और सिद्धि कोउ चाहै सो तहां लहै । 
गुण तो समूह संग ठौर-ठौर राग रंग, 
प्रेम मांहिं भीजे अंग गंग सो गिरा बहै ॥ 
संतन को व्यूह सब आगे बैठो देखियत, 
सभाजी विराजमान सुन्दर कहा कहै । 
वरष वरष प्रति होय जात जै जै कार, 
दादूजी के दरबार दौलत सदा रहै ॥२॥ 
उक्त मनहर में सभाबाईजी के संचालन समय की दादूद्वारे की स्थिति का परिचय दिया है ।
देश देश ही तैं दौरे आवत सेवक जन, 
दादूजी के दरबार देखन मिलाप जूं । 
जैसे काशी कुरुक्षेत्र मथुरा प्रयाग हेत, 
जात है जगत सब काटन का पाप जू ॥ 
परम पुनीत ठौर ऐसो न तीरथ और, 
जहां के आये से जांहिं संताप जू । 
सुन्दर शोभा अनन्त निशि दिन गावें संत, 
बाईजी विराजें गुरु गादी आपै आप जू ॥३॥ 
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उक्त मनहर में नारायणा दादूधाम को परम पुनीत तीर्थ बताते हुए कहा है कि-बाईजी को आचार्य के अभाव में गादी का संरक्षण करने के लिये समाज ने गादी के पास नहीं बैठाया था किन्तु बाईजी स्वयं ही अपने तप तेज से तब तक गादी का संरक्षण करती थीं, जब तक समाज आचार्य बैठाने पर एक मत नहीं हुआ था । यही अर्थ उक्त मनहर के “बाईजी विराजै गुरुगादी आपै आपजू” से ध्वनित होता है । 
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जब समाज मसकीनदासजी को आचार्य पद पर बैठाने में एक मत हो गया तब बाईजी सभाकुमारीजी अपने साधन धाम बाईजी की पालकां में बैठ कर निर्गुण ब्रह्म की भक्ति करने लग गई थीं । रूपकुमारीजी तो सभाकुमारीजी की अनुगामिनी ही थीं, वह भी उनके साथ ही रहती थीं । दोनों बाईजी की पालकां में ही भजन करती थीं । 
(क्रमशः)

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