मंगलवार, 22 सितंबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ५३/५६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ५३/५६*
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कहि जगजीवन कंवल मंहि, करम रहित करतार ।
उलटि सुरति१ तहां राखिये, निरखि निरंजन सार ॥५३॥
१. सुरति=स्मृति ।
जगजीवन जी कहते हैं, हृदय-कमल में वह करतार बैठा है जो कर्मों से परे है । अपनी सुरति को संसार से उलट कर वहाँ लगाओ और उस सार रूपी निरंजन को देखो ।
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कहि जगजीवन च्यारि जुग, हरि चरचा चित्त राखि ।
हरि चिंतामणि चरचिये, प्रेम सुधारस चाखि ॥५४॥
चारों युगों में बस हरि की चर्चा को ही चित्त में रखो । उस चिंतामणि रूपी हरि का स्मरण प्रेम के अमृत रस को चखते हुए करो ।
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छप्पन भोग लगाइ तहां, जहां निरंजन देव ।
कहि जगजीवन आतमा, परमातम की सेव ॥५५॥
छप्पन भोग वहीं लगते हैं जहाँ निरंजन देव है । आत्मा से परमात्मा की सेवा ही सच्चा भोग है ।
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एहि जुगति अरपै भगति, एहि भाव एहि भेद ।
कहि जगजीवन जागि जन, बिन स्वासा पढ़ि बेद ॥५६॥
इसी युक्ति से, इसी भाव और भेद से भक्ति अर्पण करो । हे जन जागो और बिना श्वास के ही वेद को पढ़ो, अर्थात अजपा जाप करो ।
("बिन स्वासा पढ़ि बेद" का अर्थ, किताब वाला वेद पढ़ना नहीं है । इसका अर्थ है अजपा जाप । 
१. हम लोग माला से या मुँह से जो जाप करते हैं, उसमें श्वास खर्च होती है । 
२. जब सुरति भीतर गगन मंडल में टिक जाती है, तब जाप अपने आप चलने लगता है - बिना जपे । 
३. वहाँ श्वास की डोरी टूट जाती है, प्राण स्थिर हो जाते हैं । 
उसी स्थिरता में वेद का असली भेद समझ में आता है । वही चारों वेदों का सार है - सोऽहम्, तत्त्वमसि । जगजीवन जी महाराज कहना चाहते हैं कि - बाहर के श्वास को रोक कर नहीं, बल्कि भीतर की सुरति को स्थिर करके उस धुन को सुनो जो बिना बजाए बज रही है । वही बिना श्वास का वेद-पाठ है । जैसे मछली पानी में रहते हुए पानी को नहीं जपती, बस उसी में रहती है - वैसे ही जीव राम में रह जाता है)
(क्रमशः) 

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