शनिवार, 5 सितंबर 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~६५/६८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~६५/६८*
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*रज्जब हरि रिधि तिनहुं की, जो जप जीवित बाल ।*
*माल न मूओं को मिले, जे खाये कर्म काल ॥६५॥*
पिता के मरने पर उसका बालक जीवित हो तो उसे धन मिलता है, मरे हुये को नहीं मिलता, वैसे ही जीवत्व अहंकार मरनै पर ब्रह्मचिन्तन रूप बाल जीवित रहता है तभी उसे ब्रह्म साक्षात्कार रूप ऋद्धि प्राप्त होती है, कर्म और काल के द्वारा खाये जाकर मरने वालों को ब्रह्म साक्षात्कार रूप माल नहीं मिलता ।
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*रज्जब भागी भूख, भजन करत भगवंत का ।*
*गये सु दारिद दूख, आपद फिर आवे नहीं ॥६६॥*
भगवान् का भजन करने से भक्तों की सभी प्रकार की आशा तृष्ण रूप भूख भाग जाती है तथा दरिद्रता जन्य दु:ख दूर जाते हैं, पुन: विपत्ति नहीं आती ।
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*माया छाया पांव तल, जब सांई सूरज शीश ।*
*रज्जब कही विचार कर, दीसै विश्वा बीस ॥६७॥*
जब सूर्य शिर पर होते हैं, तब छाया पैरों के पास नहीं आती, वैसे ही जब भजन द्वारा परमात्मा निरंतर हृदय में रहते हैं तब माया चरणों में आ गिरती है । हम ने अपने विचार करके ही कहा है और विचारशीलों को यह बात बीसों विश्वा यथार्थ ही दिखाई देती है ।
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*रंकार अलिफ१ भीतर लिखे, कागज कमल कलूब२ ।*
*अतुल तुला कैसे तुले, बिच बैठा महबूब३ ॥६८॥*
किसी दानी सेठ के बहुत आग्रह करने पर कि कुछ तो ग्रहण करो, तब नामदेव ने तुलसी पत्र पर "राँ" लिखकर कहा - "इसकी बराबर तोल दो" सेठ ने तुला पर हीरादि रत्न, सुवर्णादि धातु, अन्न, यज्ञ, दानादि सभी चढाये किन्तु "राँ" की बराबरी नहीं हुआ । वैसे ही राम मंत्र का पहला१ अक्षर "राँ" जिसके भीतर हृदय२ कमल रूप कागज पर लिखा है अर्थात उसका निरंतर चिन्तन होता है और प्रेम-पात्र३ परमात्मा भीतर बैठा है, वह भक्त भजन के प्रताप से अतुल्य है, वह कैसे किसके बराबर हो सकता है ?
(क्रमशः)

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