*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१/४*
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*सब गुण सधहि तु१ साध है, अन साधे सु असाध ।*
*रज्जब पाई प्राण ने, पूरी पारिख२ लाध३ ॥१॥*
सभी दैवी गुण रूप साधना सिद्ध कर लेता है, तो१ वही साधु कहलाता है और नहीं सिद्ध कर पाता है तब तक असाधु है । बुद्धिमान प्राणियों ने साधु असाधु की यही पूरी परीक्षा२ उपलब्ध३ की है ।
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*भगवंत न भूले सो भला, बुरा बिसारे सोय ।*
*रज्जब काढे मांड में, भले बुरे चुन दोय ॥२॥*
जो भगवान को नहीं भूले वही साधु है और भूलता है वही असाधु है, सभी ब्रह्माण्ड में खोज करने पर ये दो ही चुनकर साधु असाधु निकाले गये है ।
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*त्रिगुण तुला ऊपर तुले, कंकर पुन: कपूर ।*
*एक समाने शून्य में, एक धरा मधि धूर ॥३॥*
तुला पर तोलने से कंकर और कपूर बराबर उतर जाते हैं, किन्तु कंकर तो धरा की धूली में मिलता है और कपूर आकाश में मिलता है, वैसे ही त्रिगुणात्मक संसार में चाहे साधु - असाधु का शरीर बराबर मान लिया जाय किन्तु, साधु तो ब्रह्म को प्राप्त करता है और असाधु मायिक संसार में मिलता है ।
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*धरे माँहिं सौं धर्या ऊपजे, सो धरती ह्वै जाय ।*
*रज्जब साधु कपूर शून्य सुत, शून्यहिं माँहिं समाय ॥४॥*
धरती पर धरे पर्वत का कंकर धरती ही बन जाता है और आकाश की स्वाति बिन्दु से बना कपूर आकाश में ही समाता है, वैसे ही मायिक प्रपंच में फंसा हुआ असाधु संसार में ही रहता है और साधु ब्रह्म में समा जाता है, यही साधु असाधु की परीक्षा है ।
(क्रमशः)

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