*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२७. साधु परीक्षा का अंग ~२०/२२*
.
*तन योगी मन भोगिया, रहति१ रुपइये खोट ।*
*स्वप्ने के सूलाक२ में, उघड़ी पत्री ओट३ ॥२०॥*
तांबे के रुपये के उपर चांदी की पत्री लगा दे, तो उसमें छेद२ करते ही पत्री की आड३ हट जाती है और खोट सिद्ध होकर पोल खुल जाती है, वैसे ही तन से तो जो योगी बना है और मन से भोगी है, उसकी विरक्ता वा ब्रह्मचर्य१ में दोष है और वह तन के योगीपने की आड३ स्वप्न में हटकर उसकी पोल खुल जाती है ।
.
*मन मुक्ता काचे बुरे, माँहिं मनोरथ नीर ।*
*रज्जब राम जु जौहरी, पाड़ा२ लागे वीर१ ॥२१॥*
जब तक मोती में जल रहता है तब तक वह कच्चा है, जौहरी के पास उसके मूल्य में बट्टा२ लगाता है वैसे ही हे भाई१ ! जब तक विषय-मनोरथ मन में है, तब तक रामजी के पास उसके संतपने में बट्टा२ लगता है, अर्थात उसे पूरा संत नहीं मानते ।
.
*मन की मिटी न लालसा, तन करि परसे नाँहिं ।*
*रहति१ रुपये खोट है, तुछ मति तामा माँहिं ॥२२॥*
मन की विषयाशा तो नष्ट हुई नहीं, किन्तु शरीर से कामिनी को नहीं छूता तो उसकी विरक्तता१ वा ब्रह्माचर्य रूप रुपये में तुच्छ बुद्धि रूप ताँबा का खोट है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२७. साधु परीक्षा का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें