🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*आप तैं उपाइ बाजी, निरखि देखै सोइ ।*
*बाजीगर को यहु भेद आवै, सहज सौंज समोइ ॥*
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*जूनियां स्थान* = जूनियां स्थान की प्रणाली अज्ञात है । जूनियां में गरीबदासोत भी अपना स्थान बताते हैं । किन्तु कुछ वर्ष पूर्व मैं जूनियां गया था । वहां केवल एक माखूजी की परंपरा का स्थान है । उसकी परंपरा माखूजी के थांमे के वर्णन में दी जायगी । कनिरामजी स्वामी नारायणा ने परमेश्वरदास को आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा के स्थान का उत्तराधिकारी बताया है किन्तु परमेश्वरदासजी आत्मारामजी माखूजी की परंपरा के स्थान के उत्तराधिकारी थे ।
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हां हो सकता है कि ~गरीबदासोतों वह मसकीनदासोतों के कोई अप्रधान स्थान हों, उनके रिक्त होने पर परमेश्वरदासजी का अधिकार हो गया हो । एक स्थान ग्राम में भी था । किन्तु वह भी आत्मारामजी का ही था । ऐसा मैंने ग्राम वालों से सुना था और परमेश्वरदासजी ने आत्मारामजी के गुरु परंपरा दौलतरामजी और आत्मारामजी तथा आत्मारामजी के शिष्य के नामों से युक्त जूनियांरावजी के भूमि आदि के पट्टे भी मुझे दिखाये थे ।
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*आखतड़ी का स्थान *= आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा का स्थान आखतड़ी में था । पूर्व का संपन्न स्थान था । उसके उत्तराधिकारी रामदयालजी हुये हैं । अन्य कुछ ज्ञात नहीं है । नारायणा के अन्य स्थान = एक आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा के स्थान की प्रणाली पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं हो सकी । इस स्थान में सं. १८७९ में केवलरामजी थे । उनके मनीरामजी हुये । केवलरामजी प्रसिद्ध संत थे, दादूवाणी के कथा वाचकों में प्रधान माने जाते थे । अब यह स्थान समाप्त है ।
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नारायणा के दूसरे स्थान का कुछ विवरण इस प्रकार है~ १~हरिकृष्णदासजी वि. सं. १८०९ । २~ जीवणदासजी वि. सं. १८५९ । ३~ आशारामजी वि. सं. १८९१ । ४~ जोगीदासजी । इनमें प्रथम हरिकृष्णदासजी अच्छे संगीतज्ञ थे । वीणा वादकों में प्रधान माने जाते थे । वे प्रायः वीणा बजाते हुये हरिगुण गाते रहते थे । अच्छे महात्मा थे । भगवद् भजन ही इन का मुख्य कार्य था ।
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*हरमाड़ा का स्थान*== आचार्य चैनरामजी महाराज की शिष्य परंपरा के स्थान हरमाड़ा की परंपरा आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य १~गोर्धनदासजी वि. सं. १८४२ । २-मोतीरामजी सं. १८८० । ३~ मयारामजी ४- सेवादासजी ५~ कुशलदासजी ६- हृदयरामजी वि. सं. १९११ । ७~विसनदासजी वि. सं. १९३१ । ८- रामवगसजी सं. १९२८ । ९- देईरामजी १० जयकिशनजी ११- संतोषदासजी वि . सं. १९५१ । १२- दयालबगसजी गुड़िया सं. १९७३ । १३- आडारामजी वि. सं. २०३० । १४- मानदासजी वर्तमान में हैं । यह स्थान हरमाड़ा ग्राम के तालाब के दक्षिणी किनारे पर है । उस क्षेत्र में इस स्थान की अच्छी प्रतिष्ठा थी । यह स्थान कई जातियों का गुरुद्वारा था । इस स्थान के संतों का उस प्रदेश में अच्छा प्रभाव था ।
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१३-आडारामजी ने आचार्य रामलालजी का चातुर्मास भी करवाया था । आडारामजी भ्रमण भी करते थे । संतों के शब्दों को संग्रह भी किया करते थे । इनकी संग्रही वृत्ति थी । आप दादूवाणी का पाठ पढ़ाया करते थे । आपने बहुतों को वाणी पढ़ाई थी । ये पंच केश रखते थे । इनका स्थान एक नारायणा दादूधाम के बाग़ में और एक नारायणा के बाजार में माताजी का कुआ के पास है । इनके उत्तराधिकारी मानदास हैं । उक्त आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य परंपरा के स्थानों का परिचय इनकी परंपरा के वर्तमान स्वामी कनिरामजी ने बताया है । वही यहां लिखा गया है । इति श्री चतुर्थ अध्याय समाप्त: ४
(क्रमशः)
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