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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग १७/२०*
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कहि* जगजीवन देह थैं, अबिगत करै बिदेह१ ।
वो देहि आगै चलै, अगम ठौर करि नेह ॥१७॥
*-*. १७ से ४७ तक की साषियों में योगशास्त्र का वर्णन है ।
(१. विदेह=देहाध्यासरहित)
संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि साधक पहले इस स्थूल देह के भाव से ऊपर उठता है और देहाध्यास(मैं देह हूँ) से मुक्त होकर विदेह हो जाता है । फिर वह सूक्ष्म देह से भी आगे निकल कर, उस अगम्य स्थान(परमात्मा के धाम) से प्रेम लगा लेता है ।
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खैंचि पवन मन खोज तन, खालिक२ सौं चित लाइ ।
सहजैं बरसै प्रेम रस, जगजीवन तहां आइ ॥१८॥
{२. खालिक=सृष्टिकर्ता(सिरजनहार)}
प्राणायाम से पवन को खींच कर, मन को शरीर के भीतर खोज कर, और चित्त को सृष्टिकर्ता मालिक में लगाओ । ऐसा करने से सहज ही प्रेम के रस की वर्षा होने लगती है और साधक जगजीवन(परमात्म स्वरूप) तक पहुँच जाता है ।
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रिधि सिधि प्रहरी रांम कहि, मन मथि३ मांही पैठी ।
जगजीवन हाथी सबद, उठै तहां ही बैठि ॥१९॥
(३. मन मथि=मन का निरोध कर)
रिद्धि-सिद्धि को तो बाहर का पहरेदार समझो, उन्हें राम-नाम कह कर बाहर ही रोक दो । मन का मंथन करके, मन को रोक कर भीतर प्रवेश करो । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि भीतर अनहद हाथी के समान गम्भीर शब्द(अनहद नाद) उठ रहा है, वहीं स्थिर होकर बैठ जाओ ।
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बंक नालि४ रस पीवतां, ससिहर५ खैंचै सूर६ ।
जगजीवन तहँ सहजि घर, बाजै अनहद तूर ॥२०॥
(४. बंक नालि=तालुमूल में जिह्वा का स्पर्श) (५. ससिहर=चन्द्रनाड़ी) (६. सूर=सूर्यनाडी)
जब योगी बंकनालि(तालू मूल में जीभ लगाकर - खेचरी मुद्रा) से अमृत रस का पान करता है, तब चन्द्र नाड़ी सूर्य नाड़ी को खींच लेती है अर्थात इड़ा-पिंगला का भेद मिट जाता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि उसी सहज अवस्था रूपी घर में अनहद के तुरही-नगाड़े बजने लगते हैं ।
(क्रमशः)

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