*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२७. साधु परीक्षा का अंग ~५/८*
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*नर नक्षत्र१ दोऊ दिपहिं३, नाम ध्वजा२ जिन शीश ।*
*सो रज्जब कैसे छिपहिं, प्रकट किये जगदीश ॥५॥*
जिस तारे१ के शिर पर चोटी२ होती है और जिस नर के हृदय में भगवान का नाम-स्मरण होता है वे दोनों ही प्रकाश तथा यश से प्रदीप्त३ होते हैं, जिनको जगदीश्वर ने ही प्रकट किया है, वे कैसे छिप सकते हैं ?
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*हरि हीरा हृदय रहे, सो घट छाना नाँहिं ।*
*रज्जब दीसे दूर सों, ज्यों दीपक भोडल माँहिं ॥६॥*
जिसके हृदय में हरि रूप हीरा रहता है, अर्थात निरंतर हरि का ध्यान रहता है, वह शरीर छिप कैसे रह सकता है ? वह तो जैसे भोडल में जलने वाला दीपक दूर से ही दिखता है वैसे ही दूर देश से भी यश रूप प्रकाश द्वारा दीख जाता है ।
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*दुर्बल देही दीन मत१, रहे राम के संग ।*
*जन रज्जब जग सौं जुदे, ये संतन के अंग ॥७॥*
शरीर दुर्बल होना, विचार१ में दीनता होना, सांसारिक भावनाओं से अलग रहते हुये निरंतर नाम-स्मरण द्वारा राम के संग रहना ये ही संतों के लक्षण हैं ।
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*सकल धरे१ सौं धूत२ गति, कहीं न बाँधे मन्न ।*
*जन रज्जब जग सौं जुदे, सोई साधु जन्न ॥८॥*
संपूर्ण मायिक१ प्रपंच से कांपते२ रहते हैं, अर्थात डरते रहते हैं । किसी भी वस्तु वा व्यक्ति में आसक्ति रज्जू द्वारा मन को नहीं बाँधते, इस प्रकार सांसारिक भावनाओं से अलग रहते हैं, वे ही जन संत हैं ।
(क्रमशः)

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