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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ७३/७६*
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जल बिछुटी१ जल करि भखी, वो जीव इसमैं सीर२ ।
कहि जगजीवन प्रीति हरि, सो फिर मांग्या नीर ॥७३॥
(१. जल बिछुटी=जल से वियुक्त) (२. सीर=आकर मिले)
जैसे मछली जल से बिछुड़ जाती है, तो भी वह जल को ही याद करती है और उसी में जीती है, और अंत में फिर उसी जल में आकर मिल जाती है । वैसे ही हरि से बिछुड़ा हुआ जीव अंत में फिर हरि के प्रेम रूपी जल को ही माँगता है ।
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कहि जगजीवन मही३ मथि, राम नाम घ्रित खाइ ।
प्राण पुष्टि पावै तहां, चित मंहि हरि रस भाइ४ ॥७४॥
(३. मही=छाछ) (४. भाइ=रुचिकर लगे)
जैसे छाछ को मथ कर घी निकाला और खाया जाता है, वैसे ही इस संसार को मथ कर राम नाम रूपी घी को खाना चाहिए । इससे प्राणों को पुष्टि मिलती है और चित्त में हरि का रस रुचिकर लगने लगता है ।
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कहि जगजीवन ध्यान धरि, सिध साधक मुनि जान ।
जैसी व्यापत५ सरीर मंहि, तैसा करै बखान६ ॥७५॥
(५. व्यापत=वासना) (६. बखान=बोलना)
सिद्ध, साधक और मुनि जन ध्यान करके जानते हैं कि जिसके शरीर में जैसी वासना व्याप्त है, वह वैसी ही वाणी बोलता है ।
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पवन सकति प्रिथवी भजै, सबद सकति सब कोइ ।
कहि जगजीवन हरि सकति, हरि मंहि बासा७ होइ ॥७६॥
(७. बासा=निवास)
पवन की शक्ति पृथ्वी का आश्रय लेती है, और शब्द की शक्ति सब में बसती है । पर जो हरि की शक्ति है, उसका निवास केवल हरि में ही होता है ।
(क्रमशः)

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