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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ५७/६०*
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झिलमिल जोति पिछांणिये, तेजहि झमकै तार ।
कहि जगजीवन तहां हरि, अम्रित झरै रस सार ॥५७॥
जहाँ झिलमिल करती ज्योति है, जहाँ तेज के तारे झमकते हैं, संत जगजीवन जी कहते हैं वहीं हरि हैं और वहीं से सार रूपी अमृत रस झरता है ।
(जब साधक दसवें द्वार पर सुरति टिकाता है, तो पहले अंधेरा नहीं, एक झिलमिलाती हुई ज्योति दिखती है । जैसे बरसात में बादलों के बीच बिजली झिलमिलाए । यही आत्मा की पहली झलक है । उस झिलमिल ज्योति में आगे चलकर स्थिर तारे जैसा तेज प्रकट होता है । संतों ने उसे ही गुरु का तारा, या सुरति का तारा कहा है । वह टिमटिमाता नहीं, एकटक चमकता है । वही हरि का द्वार है। हरि कोई मूर्ति नहीं, वही प्रकाश-पुंज है, जब सुरति उस तारे में लय हो जाती है, तब वहाँ से अमृत की बूँदें टपकती हैं । योगियों ने इसे सहस्त्रार से झरता अमृत कहा है । उस एक बूँद से मन का सारा खारापन, सारा विषय-विकार मिट जाता है । फिर बाहर का कोई रस अच्छा नहीं लगता)
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नाम निरंजन निरामै२, नाराइण निज रूप ।
कहि जगजीवन निरंतर, निरगुण निरखि अनूप ॥५८॥
(२. निरामै=रोग रहित)
जगजीवन जी महाराज कहते हैं निरंजन का नाम ही रोग-रहित करने वाला है, वही नारायण का अपना रूप है । उस अनुपम निरगुण को निरंतर देखो ।
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हरि हूनर३ नर नीपजै, उपजै भगति अगाध ।
कहि जगजीवन समझि लै, सकल सिखावैं साध ॥५९॥
(३. हूनर=हुनर, कला)
सच्चा हुनर वही है जो मनुष्य में हरि को प्रकट कर दे और अगाध भक्ति उपजा दे । संत जगजीवन जी कहते हैं, जिस हुनर से हरि मिले, वही सबसे श्रेष्ठ है, सभी संतों का यही मत है ।
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जिस हूनर हरि मंहि रहै, सोइ सिरै करि जानि ।
कहि जगजीवन दूसरा, हूनर नहीं है हानि४ ॥६०॥
(४. हानि=अनर्थ, नुकसान)
जगजीवन जी महाराज कहते हैं जिस हुनर से हरि में स्थिर रह सकें उसे ही श्रेष्ठ समझा जाय, इनसे अलग जो हुनर दिखे वह हुनर नहीं हानि ही है ।
(क्रमशः)

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