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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ९७/१००*
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अण अक्षर व्यंजन सरस, घ्रित तत बस्त७ बिचार ।
कहि जगजीवन दूध दधि, गोरस हरि गुन सार ॥९७॥
(७-७. तत वस्त=मूल तत्त्व)
जैसे अक्षरों में व्यंजन में रस छिपा है, विचार करके देखो तो दूध, दही, गोरस में घी रूप मूल तत्व छिपा है, जगजीवन दास जी कहते हैं कि वैसे ही इस सारे संसार में दूध-दही के घी की तरह हरि के गुणों का सार ही सार रूप में बसा हुआ है ।
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रांम कह्या तिन सब लह्या, रांम गह्या निज मूल ।
कहि जगजीवन रांम तहां, सहज थंभ्या अस्थूल८ ॥९८॥
{८. अस्थूल=स्थूल बाह्य जगत्)}
जिसने राम नाम कह लिया, उसने सब कुछ पा लिया, जिसने राम को अपने मूल रूप में पकड़ लिया । जगजीवन दास जी कहते हैं कि जहाँ राम हैं वहाँ बाहरी स्थूल जगत का भटकाव सहज ही थम जाता है, रुक जाता है ।
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देहि चलै ना मन चलै, जे रस प्यावै रांम ।
कहि जगजीवन पिछांणै, परम पुरिश सब ठांम ॥९९॥
जिसे राम अपने प्रेम-भक्ति का रस पिला देते हैं, फिर उसकी देह सांसारिक विषयों में नहीं चलती और मन भी नहीं भटकता । जगजीवन दास जी कहते हैं कि ऐसा भक्त फिर सब जगह परम पुरुष परमात्मा को ही पहचानने लगता है ।
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रवि ससि९ दोऊ षं करि, प्रेम डोर१० ल्यौ लाइ ।
कहि जगजीवन आतमां, तहँ झूलै सुख पाइ ॥१००॥
(९-९.रवि ससि=इडा, पिंगला नाड़ी) (१०. प्रेम डोर=प्रेमा भक्ति)
इड़ा-पिंगला रूपी सूर्य-नाड़ी और चंद्र-नाड़ी दोनों को रोककर, अर्थात प्राणों को सुषुम्ना में स्थिर करके, प्रेम-भक्ति की डोरी से लौ लगाती है । जगजीवन दास जी कहते हैं कि तब आत्मा उसी प्रेम के झूले में सुख पाकर झूलती है, आनंद में मगन हो जाती है ।
(क्रमशः)

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