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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सांई कारण सब तजै, जन का ऐसा भाव ।*
*दादू राम न छाड़िये, भावै तन मन जाव ॥*
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उनकी उक्त प्रार्थना सुनकर अलखरामजी ने आसन से उठकर अपनी लंगोट को फटकारते हुये हिम वर्षा को चौकड़ी की सीमा से अलग भेज दिया । तभी से आसपास के सभी किसानों ने अलखरामजी के डूंगरी के मंदिर की पूली बांध दी । एक किसान की एक पूली में १०-१२ किलो गेहूँ निकल आते हैं, पूली एक गेहूँ की ही बांधी गई थी, वही आती है ! तब से आजतक चौकड़ी की सीमा में हानिकारक ओले नहीं पड़े हैं ।
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एक समय जयपुर नरेश ईश्वरीसिंह के पेट में दर्द रहने लगा था । वैद्य आदि ने बहुत चिकित्सा की किन्तु दर्द नहीं मिटा । तब किसी ने राजा को कहा - चौकड़ी में एक छोटी-सी डूंगरी पर अलखरामजी संत निवास करते हैं । यदि वे यहाँ आजायें तो उनकी कृपा से आपका दर्द अवश्य मिट सकता है । तब राजा ने सवारी भेजकर अलखरामजी को बुलवाया । अलखरामजी पधार गये ।
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राजा ईश्वरीसिंह ने मर्यादा पूर्वक उनको प्रणाम करके और सामने बैठकर कहा - महाराज मेरा पेट बहुत दुखता है, बहुत इलाज करा लिये किन्तु दुखना नहीं मिटा । अतः कृपा करके मेरे पेट का दुखना मिटा दें । राजा की उक्त प्रार्थना सुनकर अलखरामजी ने कहा - तुम यदि अब से आगे गरीबों का पेट नहीं दुखाओ तो तुम्हारा पेट भी अब नहीं दुख सकेगा । राजा ने अलखरामजी महाराज के आगे प्रतिज्ञा की कि - "मैं गरीबों का पेट कभी नहीं दुखाऊंगा ।" बस इतना कहते ही राजा के पेट का दर्द मिट गया ।
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फिर राजा ने अलखरामजी महाराज के ११००) ग्यारह सौ रु. भेंट किये । अलखरामजी ने वे रुपये उसी समय गरीबों को बांट दिये । राजा को ज्ञात हुआ कि अलखरामजी ने तो सब रुपये गरीबों को बांट दिये कुछ नहीं रखा । तब राजा ने पुनः प्रार्थना की - भगवन् ! आपके स्थान पर मैं कुछ सेवा करता रहूँ, ऐसी आज्ञा दीजिये । अलखरामजी ने कहा - तुम स्थान पर रोशनी का प्रबन्ध कर दो । राजा ने १०) रु. मासिक रोशनी के लिये बांध दिये । उस समय १०) रु. का तेल बहुत आता था । वे १०) रु. अब तक मिलते हैं ।
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एक वर्ष में १२ मण सांभर का नमक भी पहले जयपुर राज्य की ओर से आता था । वह भी राजा ईश्वरीसिंह का ही बांधा हुआ था । एक समय खेतड़ी नरेश अभयसिंह राजावतों से बबाई ग्राम छीनने के लिये युद्ध की तैयारी कर रहे थे । सुना जाता है कि राजावतों के पक्ष में एक नाथ संप्रदाय का सिद्ध संत था । उसकी करामात से युद्ध में विजय पाना कठिन समझा जा रहा था । अतः उस सिद्ध की शक्ति को कुंठित करने के लिये खेतड़ी नरेश अभयसिंह को भी एक सिद्ध संत की सहायता की आवश्यकता पड़ी और पूरां करामाती महात्मा की खोज होने लगी ।
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तब मुलकपुरिये सरदार जो खेतड़ी नरेश के उस समय के वीर सैनिकों में मुख्य थे, वे अलखरामजी की शक्ति से परिचित थे और उनको ही अपना पूजनीय गुरु भी मानते थे । अतः खेतड़ी नरेश अभयसिंह को उन्होंने अलखरामजी की शक्ति का परिचय दिया । तब राजा ने कहा - आप जाकर उन्हें खेतड़ी लाओ । राजाज्ञा से मुलकपुरिये ठाकुर अलखरामजी के पास गये और खेतड़ी पधारने की प्रार्थना की ।
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अलखरामजी महाराज ने प्रार्थना स्वीकार करके कहा - तुम चलो मैं तुमको आगे मिलूंगा । मुलकपुरिये ठाकुर ने पूछा - आगे कहां मिलेंगे ? अलखरामजी ने कहा - खेतड़ी में पहाड़ी पर श्मशान भूमि है, वहां एक सती की मंढ़ी है, उसी में मुझे देख लेना । ऐसा कहकर ठाकुर को विदा कर दिया । ठाकुर खेतड़ी पहुंचकर श्मशान भूमि में गया और सती की मंढ़ी में अलखरामजी महाराज को भजन करते हुये देखा । देखते ही ठाकुर को अति आश्चर्य हुआ । फिर अलखरामजी महाराज की शक्ति से नाथ सिद्ध की शक्ति कुंठित हो गई और यथा समय खेतड़ी की सेना ने हमला करके विजय प्राप्त की । उसी समय अलखरामजी महाराज ने खेतड़ी के स्थान की स्थापना की थी ।
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अलखरामजी महाराज अपने समय के महान् सिद्ध संत थे । अलखरामजी महाराज के सात शिष्य थे - १- आत्मारामजी २- मयारामजी ३- बलदेवदासजी ४- कृपारामजी ५- दयारामजी ६- रामधनजी ७- केवलदासजी । अलखरामजी महाराज वि. सं. १८९१ भादवा सुदि ९ शुक्रवार को ब्रह्मलीन हुये । उनकी गद्दी पर चौकड़ी में उनके शिष्य रामधनजी विराजे । चौकड़ी स्थान की परंपरा इस प्रकार है १- चेतनदासजी २- क्षेमदासजी ३- सुखरामजी ४- अलखरामजी ५- रामधनजी ६- रामदासजी ७- रामरतनजी ८- बालदासजी ९- हीरादासजी १०- श्यामदासजी वर्तमान हैं ।
(क्रमशः)

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