रविवार, 4 अक्टूबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग १०१/१०४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग १०१/१०४*
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जहां नित झूलै आतमा, पंच सखी मन राइ ।
हरि हिंड़ौलै११ हरहिये१२, जगजीवन जस गाइ ॥१०१॥
(११. हिंडौलै=झूले में)    (१२. हरहिये=झूलिये) 
जब मन रूपी राजा अपनी पाँच सखी रूपी इन्द्रियों के साथ वश में होकर आत्मा के साथ हरि के प्रेम-हिंडोले में झूलता है, तब जीव को सच्चा सुख मिलता है । संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि पाँचों सखियाँ जब मन के साथ मिलकर संसार की ओर जाती हैं तो भटकाती हैं, और जब आत्मा के साथ मिलकर हरि की ओर झूलती हैं तो वही आनंद रूप होकर हरि यश गाती हैं ।
मढ़ी१३ गगन१४ मैं ले धरै, गगन मढ़ी मैं बास ।
सोइ सेवग हरि सौं रमैं, सु कहि जगजीवनदास ॥१०२॥
(१३. मढ़ी=कुटिया)   (१४. गगन=शून्य में) 
जो अपनी कुटिया-देह को शून्य-गगन में ले जाकर रख दे और शून्य-गगन को ही अपनी कुटिया में बसा ले, अर्थात देह को ब्रह्म में और ब्रह्म को देह में एक कर दे, संत जगजीवनदास जी कहते हैं वही सच्चा सेवक हरि में रमता है ।
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गगन मढ़ी धरती द्रिढ़ी, अढ़ी१ एक मैं बास ।
रांम रांम धुंनि नाद हरि, सु कहि जगजीवनदास ॥१०३॥
(१.अढी=दृढ़ता से)
जिसकी कुटिया रूपी देह गगन में दृढ़ है, यानी शून्य में स्थित है और धरती पर भी दृढ़ है, जो एक ही परम तत्व में दृढ़ता से बसा हुआ है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं उसके भीतर हरि नाम की, राम-राम की ध्वनि का नाद निरंतर गूँजता रहता है ।
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लेखै धरती अहूंठ२ करि, चलतां ओड़३ न अंत४ ।
कहि जगजीवन रांमजी, कहुं प्रमाण है कंत ॥१०४॥
(२. हूंठ=असीमित)  (३. ओड=आदि का किनारा)   (४. अंत=अन्त का किनारा)
इस धरती को यदि असीमित मानकर लेखा-जोखा करो, तो चलते-चलते न इसका आदि किनारा मिलता है न अंत किनारा मिलता है । जगजीवन दास जी कहते हैं कि हे राम जी, हे मेरे कंत, आपका प्रमाण-आपका पारावार कहाँ है, आप तो इससे भी असीम हो ।
(क्रमशः) 

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