🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*आपा मेटै हरि भजै, तन मन तजै विकार ।*
*निर्वैरी सब जीव सौं, दादू यहु मत सार ॥*
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*भक्तरामजी*
भक्तरामजी बाईजी के थांभे के संत थे । उदयपुर(शेखावाटी) टीटैड़ा स्थान में दीक्षित थे । ये उदयपुर के श्मशान में ठहरे हुये थे । ग्राम के कुछ लोग उनको यह कहकर छेड़ने लगे कि- यहां तो आते हैं और बलते हैं । तुम यहां क्यों ठहरे हो चले जाओ । फिर अधिक छेड़ने लगे तब उनके मुख से भी निकल गया कि- आते जाओ और बलते जाओ । पीछे तो नित्य मरणे लगे नित्य श्मशान चेतने लगा । तब लोग घबरा कर भक्तरामजी के चरणों में पड़े । तब रोटी का चौथा भाग भिक्षा का बँधान बँधा कर आशीर्वाद दिया कि अब पूर्ववत नहीं होगा । तब रोज श्मशान चेतना बंध हुआ ।
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*रामतलाई स्थान कोटा*
कोटा(राजस्थान) में रामतलाई स्थान बाईजी के थांभे का है । इस स्थान में एक सती की छत्री है और दूसरी छत्री में साधुओं के चरण हैं । चरणों के लेख पढ़ने में नहीं आते । स्थान में शिला लेख भी है किन्तु वह भी नहीं पढ़ा जा सका । इस स्थान के पास ही एक छोटी तलाई है । उसी का नाम रामतलाई है । हो सकता है पहले संत यहां भजन करते रहे हों और उन्होंने लोकोपकार के लिये तलाई बनवाई हो । इसीसे रामतलाई नाम रख दिया हो फिर वहां ही उनका साधन धाम बन गया । इससे रामतलाई का स्थान कहलाने लगा हो ।
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इस स्थान में मस्तरामजी महाराज सिद्ध पुरुष हुये हैं । श्री दादूवाणी मंदिर में वाणीजी के पास मस्तरामजी महाराज का एक काले रंग का घोटा(काष्ठ का दंडा) रखा है । उस घोटे को साथ ले जाने से प्रतिदिन तीन पाव गेहूं मिलते हैं, ऐसा पढ़ने में आया है । हो सकता है, घोटा साथ ले जाने से उस व्यक्ति को स्थान के वाणी मंदिर का पुजारी जानकर कोटा नरेश की ओर से व धान मंडी से मिलते होंगे ।
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कोटा राज्य के समय स्थान पर कोर्ट थी और सेवा पूजा करने वाले को कोटा राज्य से १५) रु. मिलते थे । फिर दश रुपये मिलने लगे थे । इस स्थान के संत को कोटा राज्य से महन्त की पदवी थी । राज दरबार में यहां के महन्त को कुर्सी मिलती थी ।
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*झरणा का स्थान*
रामतलाई स्थान से सम्बन्ध रखने वाला एक स्थान और है जो झरणे का स्थान कहलाता है । कारण ?- यह झरणे के ऊपर है । यह कोटा नगर के परकोटे के बाहर है, पुराने सरकारी महलों के सामने झरणे के ऊपर है । यह स्थान अति रमणीक है । इस स्थान के अधिपति हनुमानदासजी हैं । कोटा राज्य से इस स्थान की सेवा पूजा करने वाले को १०) रु. मासिक मिलते थे और झोली आती है ।
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हनुमानदासजी इस स्थान के पूर्वज महात्माओं के विषय में कुछ नहीं जानते । मैंने उनको पत्र दिया था उसका उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया । मैंने जो उक्त विवरण लिखा है सो श्री दादूदयालु महासभा की ओर से स्थानों का विवरण प्राप्त करने के लिये भेजे हुये साधु मनसारामजी के लिखे हुये रजिस्टर के आधार पर ही लिखा है । अतः उक्त स्थानों के महात्माओं का पूरा परिचय नहीं मिल सका ।
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*रतिरामजी*
रतिरामजी बाईजी के थांभे के संत थे और भ्रमण करते हुये उत्तर प्रदेश में चले गये थे । उस प्रदेश के इटजा के राजा रामसिंह पँवार की राणी के भयंकर रोग हो गया था । वह बहुत चिकित्सा करने पर भी नहीं मिटा था । उसे पंडित रामदत्त ने श्री दादूजी का चरित्र सुनाया था उससे उसका भयंकर रोग मिट गया था । इससे उसकी दादूजी महाराज की परंपरा के संतों में बहुत प्रीति हो गई थी । वह चाहती थी कि मैं दादूजी की परंपरा के संत को ही गुरु बनाऊंगी ।
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उन्हीं दिनों में रतिरामजी इटजा पहुंच गये थे । राणी को जब ज्ञात हुआ कि हमारे नगर में दादूजी की परम्परा के एक अच्छे संत आये हुये हैं । तब उसने रतिरामजी को बुलवाकर शिष्या बनाने की प्रार्थना की- तब रतिरामजी ने राजा रामसिंह की पत्नी को दादूवाणी के गुरुदेव के अंग के अंत में जो अविचल मंत्र(गुह्य मंत्र) है, वही देकर शिष्या बनाई थी । रतिरामजी अच्छे विरक्त महात्मा थे । यह कथा नारायणदासजी जनगरीबजी के थांभे वालों ने अपने रचित श्रीदादू चरित्र में दी है । उसी में से यहां दी गई है ।
इति श्री सप्तम अध्याय समाप्त: ७
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*खालसा पर्व का माहात्म्य*
दोहा- खास शिष्य आचार्यों के, चरित्र इस के मांहि ।
पर्व दूसरा खालसा, सुख प्रद संशय नांहि ॥१॥
पढ़ता श्रद्धा भाव से, उसे होय आनन्द ।
दोष दृष्टि से जो पढ़े, लहै न सुख सो मंद ॥२॥
हरजी रामजी आदिका, चरित्र इस में देख ।
कोउ आश्चर्य नहिं करे, होते संत अलेख ॥३॥
पढ़े इसे निष्काम हो, लहै भक्ति निज ज्ञान ।
सकाम की भी कामना, पूर्ण करें भगवान ॥४॥
नर निष्काम सकाम का, हित कर है यह पर्व ।
पढ़े प्रेम से सुख लहैं, सभी महत अरु खर्व ॥५॥
परब्रह्म परात्परं, सो मम देव निरंजनम् ।
निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनम् ॥
इति श्री द्वितीय खालसा पर्व समाप्त: २॥
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